आखिर क्या हो सकते हैं भूलने की बीमारी (डिमेंशिया )के शुरुआती लक्षण जो अपनों में देखने को मिल सकते हैं? डॉक्टर से जानें इसके बारे में!

आज हर कोई दिमाग से जुड़ी किसी न किसी समस्या से पीड़ित है, जिसमें भूलने की बीमारी सबसे आम है। इसे डिमेंशिया के नाम से भी जाना जाता है, जो धीरे-धीरे बहुत से लोगों को अपनी चपेट में ले लेती है। दरअसल, आपकी जानकारी के लिए आपको बता दें, कि डिमेंशिया केवल भूलने की ही बीमारी नहीं है, बल्कि यह एक इस तरह की मानसिक स्थिति है, जो धीरे-धीरे पीड़ित व्यक्ति को बुरी तरीके से प्रभावित कर देती है। इसमें एक व्यक्ति की याददाश्त, सोचने-समझने की क्षमता कमजोर होना, रोजाना के काम बुरी तरीके से प्रभावित होना और व्यवहार में बदलाव होना शामिल है। 

डिमेंशिया मतलब कि भूलने की बीमारी जो ज्यादातर बुजुर्ग लोगों में ही देखने को ही मिलती है। पर, आज इस समस्या की चपेट में युवा भी आ रहे हैं। इसका कारण ज्यादातर काम में फोकस करके दिन रात सोचते रहना और तनाव लेना जैसी स्थिति शामिल है। हम में से ज्यादातर लोग इस समस्या को आम समझ कर नजरअंदाज कर देते हैं और समय रहते डॉक्टर के पास नहीं जाते हैं। इसी के कारण यह समस्या आगे चलकर एक गंभीर बीमारी का रूप धारण कर लेती है। 

आम तौर पर, ऐसा ही हम अपने बुजुर्ग माता-पिता के साथ करते हैं। दरअसल, इस समस्या के शुरुआती संकेतों को हम उम्र से जुड़ी समस्या समझ कर ऐसे ही नजरअंदाज कर देते हैं और सब कुछ ऐसे ही चलने देते हैं। पर, ऐसा करना बुजुर्ग लोगों की दिमागी सेहत के लिए बिल्कुल भी ठीक नहीं होता है। इसलिए, वक्त रहते इस समस्या के शुरूआती लक्षणों पर ध्यान देना अति आवश्यक होता है, ताकि डिमेंशिया जैसी समस्या से पीड़ित व्यक्ति को सही और समय पर इलाज मिल सके और किसी बड़ी समस्या का शिकार होने से बच सके। दरअसल, डिमेंशिया के शुरुआती लक्षणों में, याद रखने की क्षमता कम होना, चीजों को रख कर भूल जाना, गलत जगहों पर सामान रखना, चिड़चिड़ापन बढ़ना, बिना किसी कारण के तनाव लेना, रास्ता भूल जाना, मूड में बदलाव होना और सामाजिक गतिविधियों से दूरी बनाना जैसे लक्षण शामिल हो सकते हैं, जिनको नजरअंदाज करना एक व्यक्ति की सेहत के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है। आगे चलकर यह किसी बड़ी बीमारी का कारण बन सकता है, इसलिए डॉक्टर से मिलना आवश्यक होता है। आइये इस लेख के माध्यम से इसके बारे में इस के डॉक्टर से और विस्तार से जानकारी प्राप्त करते हैं। 

डिमेंशिया के शुरुआती लक्षण

दरअसल, डिमेंशिया के शुरुआती लक्षण निम्नलिखित अनुसार हो सकते हैं, जिनको लोग उम्र से जुड़ी समस्या समझ कर नजरअंदाज कर देते हैं: 

  1. याद रखने की क्षमता कम होना 

लोगों की उम्र बढ़ने के साथ-साथ किसी भी चीज को याद रखने की क्षमता भी कम होने लग जाती है। यह आम हो सकती है, पर इस पर गौर करना अति आवश्यक होता है, क्योंकि यह डिमेंशिया का शुरुआती संकेत होता है, जो बढ़ने पर गंभीर भी हो सकता है। 

  1. गलत स्थानों पर सामान रखना

बार-बार और लगातार गलत जगहों पर चीजों को रखना डिमेंशिया का लक्षण हो सकता है, जो आम नहीं होता है। 

निष्कर्ष: डिमेंशिया जिसे भूलने की बीमारी कहा जाता है, जो ज्यादातर बुजुर्ग लोगों को प्रभावित करती है। पर, आज यह समस्या युवाओं में भी देखने को मिल सकती है। डिमेंशिया के लक्षण अक्सर लोग नजरअंदाज कर देते हैं, क्योंकि इसके लक्षण शुरुआत में मामूली नजर आते हैं, जो आगे चलकर किसी बड़ी और गंभीर समस्या का कारण बनते हैं। इसलिए, इसके शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज करने की बजाए इन पर ध्यान देना अति आवश्यक होता है। इसके शुरुआती लक्षणों में रोजाना आने जाने वाले रास्तों को भूल जाना, चीजों को कहीं पर रख कर भूल जाना, चीजों को गलत जगह पर रख देना, व्यवहार में बदलाव होना और तनाव आदि होना शामिल हो सकता है। याद रहे, अगर परिवार के किसी भी मेंबर में इस तरह के लक्षण दिखाई देते हैं, तो आपको तुरंत डॉक्टर से मिलना चाहिए और समस्या बढ़ने से पहले ही कंट्रोल में करनी चाहिए। इसके बारे में ज्यादा जानने के लिए और दिमाग से जुड़ी किसी भी समस्या का समाधान पाने के लिए आप आज ही न्यूरो सिटी हॉस्पिटल के विशेषज्ञों से संपर्क कर सकते हैं। 

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

प्रश्न 1. डिमेंशिया रोग सबसे ज्यादा किसको प्रभावित करता है?

डिमेंशिया रोग ज्यादातर 65 साल से भी ज्यादा उम्र के बुजुर्ग लोगों को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है। हालंकि, जैसे-जैसे एक व्यक्ति उम्र बढ़ती जाती है, वैसे -वैसे इस समस्या का खतरा भी बढ़ता जाता है। 

प्रश्न 2. डिमेंशिया रोग कैसे होता है?

डिमेंशिया रोग जिसे भूलने की बीमारी भी कहा जाता है। इस समस्या का निर्माण दिमाग के सेल्स डैमेज या फिर खत्म होने की वजह से होता है। यह समस्या विशेष तौर पर उम्र बढ़ने, जेनेटिक्स या फिर स्ट्रोक जैसी मेडिकल स्थितियों से भी जुड़ी हुई होती है। 

 

प्रश्न 3. क्या डिमेंशिया का कोई इलाज है?

दरअसल, वर्तमान में डिमेंशिया का ऐसा कोई भी इलाज नहीं है, जो इस समस्या को पूरी तरीके से खत्म कर सके। केवल दवाओं, थेरेपी और इलाज की सहायता से इस समस्या के लक्षणों को कंट्रोल में किया जा सकता है। 

प्रश्न 4. किस कमी के कारण दिमाग कमजोर हो सकता है?

शरीर में विटामिन बी12, विटामिन डी, आयरन और ओमेगा-3 फैटी एसिड की कमी के कारण दिमाग कमजोर होने साथ-साथ व्यक्ति की याददाश्त भी काफी ज्यादा कम हो सकती है। शरीर में इन पोषक तत्वों की कमी के कारण नर्वस सिस्टम काफी ज्यादा कमजोर हो जाता है, जिसकी वजह से एक व्यक्ति को फोकस में कमी, सुस्ती और भूलने जैसी समस्यायों का सामना करना पड़ सकता है। 

प्रश्न 5. डिमेंशिया के लक्षणों को कंट्रोल करने के लिए किन तरीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है? 

डिमेंशिया जैसी समस्या के लक्षणों को कंट्रोल करने के लिए नियमित शारीरिक और मानसिक व्यायाम करना, नियमित जांच करवाना, सेहतमंद आहार का सेवन करना, समाज से संपर्क बनाए रखना और नशीली वस्तुओं से दूरी बना कर रखना जैसे कुछ उपायों का इस्तेमाल कर सकते हैं।

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    आखिर शरीर के किन अंगों को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है टीबी? डॉक्टर से जानें, इसके खतरनाक लक्षणों के बारे में!

    ऐसी कई बीमारियां हैं, जो हमारे दिमाग को बुरी तरीके से प्रभावित करती हैं और हमारे रोजाना के काम पर काफी बुरा असर डालती हैं। दिमाग को प्रभावित करने वाली समस्याओं में टीबी की बीमारी भी शामिल है। दरअसल, टीबी एक संक्रामक बीमारी है, जिस से आज दुनिया के बहुत से लोग जूझ रहे हैं। इस समस्या का निर्माण माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरक्लोसिस बैक्टीरिया की वजह से होता है। अगर इस समस्या की पहचान समय पर न की जाए, तो यह एक व्यक्ति के लिए घातक साबित हो सकती है। वहीं, यह बीमारी मुख्य रूप से हवा के माध्यम से एक से दूसरे व्यक्ति में भी आसानी से फैल सकती है। ऐसे में, जब संक्रमित व्यक्ति खांसता, छींकता या फिर काफी तेजी से बोलता है, तो बैक्टीरिया हवा में फैल जाते हैं और बीमारी एक दूसरे को होना लाजमी है। स्वस्थ व्यक्ति भी इस बीमारी की चपेट में आ सकता है। रात में पसीना आना, तेजी से वजन कम होना, थकान और कमजोरी होना यह इस समस्या के लक्षण हो सकते हैं। जिन पर ध्यान देकर इलाज करवाना बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। दरअसल, आपकी जानकारी के लिए आपको बता दें, कि वैसे तो यह बीमारी विशेष तौर पर फेफड़ों को प्रभावित करती है। पर, यह बीमारी केवल फेफड़ों तक ही सिमित नहीं है, बल्कि यह शरीर के और भी कई अंगों को बुरी तरीके से प्रभावित करती हैं, जिसमें दिमाग, हड्डियां और लिम्फ नोड्स शामिल हो सकते हैं। 

    टीबी शरीर के किन अंगों को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है?

    दरअसल, टीबी शरीर के निम्नलिखित अंगों को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है, जैसे 

    1. लिम्फ नोड्स

    लिम्फ नोड्स जिन को लसीका ग्रंथियां या लसीका गांठें भी कहा जाता है। दरअसल, यह एक छोटी, बीन के आकार की ग्रंथियां होती है, जो पूरे शरीर में मौजूद होती है और प्रतिरक्षा प्रणाली का हिस्सा भी होती हैं। यह सच है, कि लिम्फ नोड्स में टीबी की समस्या हो सकती है। आम तौर पर, गर्दन, बगल या फिर जांघ के पास मौजूद लिम्फ नोड्स पर टीबी की बीमारी अपना बुरा प्रभाव डाल सकती है। इसके कारण कई लक्षण नजर आ सकते हैं, जिसमें गर्दन में गांठ बनना, गर्दन में सूजन होना गांठ का धीरे-धीरे बढ़ना या फिर इसमें कभी-कभी दर्द होना जैसे लक्षण शामिल हो सकते हैं। 

    1. दिमाग

    टीबी से दिमाग की झिल्लियों पर पड़ने वाले असर को टीबी मेनिनजाइटिस कहा जाता है। मतलब कि टीबी दिमाग में भी हो सकता है। यह स्थिति बेहद खतरनाक हो सकती है, इसलिए तुरंत डॉक्टर से मिलना चाहिए। 

    टीबी के कौन से लक्षण खतरनाक साबित हो सकते हैं? 

    आम तौर पर, टीबी के निम्नलिखित लक्षण काफी ज्यादा खतरनाक साबित हो सकते हैं, जैसे कि 

    1. खून वाली खांसी आने पर, टीबी की बीमारी को खतरनाक माना जाता है। यह फेफड़ों में एक गंभीर संक्रमण का संकेत होता है। 
    2. ऐसे में, पीड़ित व्यक्ति को तेज बुखार रहना, बीमारी का गंभीर लक्षण होता है। पीड़ित व्यक्ति का तेजी से वजन कम होना टीबी के गंभीर संकेतों में से एक होता है। 
    3. टीबी के दौरान फेफड़ों पर काफी ज्यादा बुरा प्रभाव पड़ता है, जिससे पीड़ित व्यक्ति को सांस लेने में काफी दिक्क्त महसूस होती है। 
    4. बेहोश हो जाना और दौरे पड़ना भी टीबी के खतरनाक होने का एक गंभीर संकेत होता है। 

    निष्कर्ष: दरअसल, टीबी एक आम बीमारी है, जिससे आज दुनिया भर में लाखों लोग प्रभावित हैं। इसे संक्रामक बीमारी कहा जाता है, जो माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरक्लोसिस बैक्टीरिया के कारण होती है। यह बीमारी ज्यादातर पीड़ित व्यक्ति के फेफड़ों को प्रभावित करती है, जसिके कारण उसको सांस लेने में भी काफी ज्यादा दिक्क्त महसूस होती है। यह समस्या केवल फेफड़ों तक ही सिमित नहीं है, बल्कि इसके कारण शरीर के और भी कई अंग प्रभावित हो सकते हैं, जिसमें लिम्फ नोड्स, हड्डियां और दिमाग का बुरी तरीके से प्रभावित होना शामिल है। दरअसल, शरीर के इन अंगों को भी सबसे ज्यादा प्रभावित करना है टीबी। टीबी की बीमारी जोड़ों को काफी ज्यादा नुकसान पहुंचा सकती है। दिमाग का टीबी व्यक्ति के लिए जानलेवा साबित हो सकता है। टीबी की बीमारी लगातार खांसी, शाम को तेज बुखार, रात में पसीना, कमजोरी, थकान और तेजी से वजन कम होने का कारण बन सकता है। समस्या के दौरान इन लक्षणों को नजरअंदाज करने की बजाए आपको चरण अपने डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए और वक्त पर इस समस्या का इलाज करवाना चाहिए, ताकि घातक स्थिति से बचा जा सके। समस्या गंभीर होने पर और लक्षण तेजी से बढ़ने पर आपको तुरंत अपने डॉक्टर से इसका समाधान पूछना चाहिए। इस के बारे में ज्यादा जानकारी प्राप्त करने के लिए और अगर टीबी के कारण आपकी हड्डियां और दिमाग प्रभावित हो रहे हैं, तो इसका समाधान पाने के लिए आप आज ही न्यूरो सिटी हॉस्पिटल के विशेषज्ञों से संपर्क कर सकते हैं। 

    अक्सर पूछे जाने वाले सवाल!

    प्रश्न 1. क्या लोगों में टीबी की समस्या होना आम है? 

    भारत में टीबी को एक प्रमुख स्वास्थ्य समस्या माना जाता है, जहाँ हर साल लाखों लोग इस समस्या की चपेट में आ जाते हैं। हाँ, यह बात बिलकुल सच है, कि टीबी दुनिया भर में लोगों को होने वाली एक आम समस्या है। विशेष तौर पर, एशिया और अफ्रीका जैसे क्षेत्रों में यह समस्या काफी आम पाई जाती है। 

    प्रश्न 2. टीबी की समस्या में क्या खाना सबसे बेहतर होता है? 

    दरअसल, टीबी की समस्या के दौरान उच्च प्रोटीन, कैलोरी और विटामिन से भरपूर संतुलित और सेहतमंद खाने को सबसे ज्यादा बेहतर माना जाता है। इसके लिए आप अपनी डाइट में, दूध, दालें, सोयाबीन, ताजे फल, सब्जियां और साबुत अनाज को शामिल कर सकते हैं। यह वजन बढ़ाने और इम्यूनिटी को मजबूत करने में काफी मददगार साबित होते हैं। 

    प्रश्न 3. टीबी की समस्या किन लोगों को अधिक प्रभावित करती है?

    आम तौर पर, टीबी की समस्या ज्यादातर कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली वाले लोगों को काफी ज्यादा प्रभावित करती है। इसमें मधुमेह से पीड़ित लोग, कैंसर से पीड़ित व्यक्ति, कुपोषित लोग, बुजुर्ग और छोटी उम्र के बच्चे शामिल हो सकते हैं।

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      ब‍िना ब्रेक के काम करने पर मानस‍िक स्‍वास्‍थ्‍य को किन नुकसानों को पड़ सकता है झेलना? डॉक्टर से जानें इसके बारे में!

      दरअसल, बहुत बार यह देखने को मिलता है, कि लोग बिना ब्रेक लिए काम करते रहते हैं। आम तौर पर, हमारे परिवार में से ही ऐसे बहुत से लोग होते हैं, जो बिना ब्रेक लिए नॉनस्टॉप काम करते हैं और यही आदत आगे चलकर घर के किसी न किसी मेंबर को पड़ जाती है। इस तरह की स्थिति में, बच्चे अपने माता पिता को बिना ब्रेक लिए काम करता देख, उन में भी यह आदत आ जाती है, जिस में कि वह काम के प्रेशर में ब्रेक भी नहीं लेते हैं और नॉनस्टॉप काम में ही लगे रहते हैं। 

      दरअसल, आपकी जानकारी के लिए आपको बता दें, कि हम में से बहुत से लोग काम के प्रेशर की वजह से बीच-बीच में ब्रेक लेना भूल जाते हैं और लगातार कई घंटों तक काम में ही व्यस्त रहते हैं। डॉक्टर के अनुसार, अगर कोई व्यक्ति लगातार काम करता रहता है और बीच-बीच में बिल्कुल भी ब्रेक नहीं लेता है, तो यह आदत उसके दिमाग की सेहत के लिए बिल्कुल भी अच्छी नहीं मानी जाती है। दरअसल, इसकी वजह से एक व्यक्ति को शारीरिक समस्याओं के साथ-साथ मानसिक समस्याओं का भी शिकार होना पड़ सकता है। 

      आम तौर पर, विश्व स्वास्थ्य संगठन और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की एक ग्लोबल मॉनिटरिंग रिपोर्ट के अनुसार, हफ्ते में 55 घंटे से भी ज्यादा समय तक काम करने वाले लोगों को मानसिक तनाव, दिल की बीमारियां और नींद की कमी होना जैसी कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। आम तौर पर, काम के दौरान ब्रेक लिए बिना काम करने पर मानसिक सेहत को बहुत से नुकसानों का सामना करना पड़ सकता है, जिसमें एंग्जाइटी होना, चिड़चिड़ापन होना, गुस्सा आना, तनाव बढ़ना, डिप्रेशन जैसी समस्या होना, मानसिक थकान से फोकस घटना और नींद की कमी होना जैसी कई नुक्सान शामिल हो सकते हैं। 

      बिना ब्रेक लिए काम करने पर शारीरिक और मानसिक सेहत बुरी तरीके से प्रभावित हो सकती है। इस तरह की समस्याओं से अपना बचाव करने के लिए काम के दौरान ब्रेक लेना बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। इससे न केवल शारीरिक सेहत बनी रहती है, बल्कि इस से मानसिक सेहत भी बरकरार रहती है। आइये इस लेख के माध्यम से ब्रेक ना लेने पर मानसिक सेहत को होने वाले नुक़्सानो के बारे में इस के डॉक्टर से और विस्तार से जानकारी प्राप्त करते हैं। 

      बिना ब्रेक के काम करने पर मानस‍िक स्‍वास्‍थ्‍य को होने वाले नुकसान 

      हम में से ज्यादातर लोग काम के प्रेशर की वजह से बिना ब्रेक लिए लगातार कई घंटों तक काम करते रहते हैं। बिना ब्रेक के लगातार काम करने पर मानसिक सेहत को कई तरह के नुक़्सानो का सामना करना पड़ सकता है, जिसमें से कुछ निम्नलिखत अनुसार हो सकते हैं, जैसे कि 

      1. मानसिक तनाव का बढ़ना 

      दरअसल, जब आप किसी काम की वजह से अपने दिमाग को बिल्कुल भी आराम नहीं देते हैं और लगातार कई घंटों तक इस को काम में व्यस्त रखते हैं, तो इस से दिमाग की सेहत को कई नुकसान हो सकते हैं। यह स्थिति ठीक उसी तरह होती है, जैसे कि हम बिना रुके थोड़ रहे हों। इस दौरान सांस फूलने, पैरों में काफी ज्यादा दर्द होने जैसे संकेतों से हम समझ जाते हैं, कि हमारा शरीर अब थक चुका है, अब उसको आराम की काफी ज्यादा जरूरत है। इसी तरह हमारा दिमाग भी होता है, जिसके थकने के संकेतों को समझ कर उसको आराम प्रदान करना बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। इस तरह की स्थिति में जब आप बिना रुके किसी भी काम को लगातार कई घंटों तक करते रहते हैं, तो इस दौरान चिड़चिड़ापन, किसी भी काम में मन न लगना, हर वक्त तनाव महसूस होना जैसे संकेतों से आपका दिमाग बताता है, की वह अब काफी ज्यादा तक चूका है, उसको अब आराम की काफी ज्यादा जरूरत है। दरअसल, इन समस्याओं पर ध्यान न देने पर, यह समस्याएं आगे चलकर एंग्जाइटी डिसऑर्डर जैसी समस्या में बदल सकती हैं। 

      1. एंग्जाइटी या फिर डिप्रेशन जैसी समस्या होना 

      काम के दौरान किसी भी तरह की कोई भी ब्रेक न लेने पर आप कई तरह की स्थितियों से गुजर सकते हैं, जो आपकी मानसिक सेहत को बुरी तरीके से प्रभावित कर सकती है। इसमें खुद पर ध्यान न देना, सोशल कनेक्शन न बना पाना और न ही आराम कर पाना जैसी कुछ गंभीर स्थितियां शामिल हो सकती हैं। आम तौर पर, इसकी वजह से दिमाग में न केवल नकारात्मक विचार आते हैं, बल्कि इसकी वजह से एक व्यक्ति को एंग्जाइटी और डिप्रेशन जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। काम में ब्रेक लेना बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण होता है, ऐसा न करने पर नींद का पैटर्न बुरी तरीके से प्रभावित होता है और मूड डिसऑर्डर जैसी समस्याओं का सामना भी करना पड़ता है। मानसिक शांति के लिए हर व्यक्ति को काम के दौरान ब्रेक लेना बहुत ही ज्यादा जरूरी होता है। 

      90 मिनट काम करके 20 मिनट की ब्रेक जरूर लें!

      हर व्यक्ति के लिए काम के दौरान ब्रेक लेना बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। डॉक्टर के अनुसार, 90 मिनट काम करके और फिर 20 मिनट तक की ब्रेक लें, ऐसा करने पर आप मानसिक समस्याओं से अपना बचाव कर सकते हैं और दोबारा अपने काम पर बेहतर तरीके से फोकस कर सकते हैं। ब्रेक के दौरान उसी जगह पर न बैठे रहें, इस दौरान कुछ वक्त तक के लिए बाहर टहलें, गहरी सांस लें या फिर हल्का संगीत सुनें। 

      निष्कर्ष: ब्रेक लिए बिना किसी भी काम को लगातार कई घंटों तक करने पर मानसिक सेहत को कई तरह के नुकसानों का सामना करना पड़ सकता है, जिस में डिप्रेशन, एंग्जायटी, तनाव और नींद में कमी शामिल हो सकती है। काम के बाद ब्रेक लेना हर व्यक्ति के लिए महत्वपूर्ण होता है। इसके बारे में ज्यादा जानने के लिए और दिमाग से जुड़ी किसी भी समस्या का तुरंत समाधान पाने के लिए आप आज ही न्यूरो सिटी हॉस्पिटल में जाकर इसके विशेषज्ञों से इसके बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

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        क्या आप भी हर चीज़ के बारे में बहुत ज्यादा सोचते हैं? डॉक्टर से जानें इसके मानसिक प्रभावों के बारे में!

        काम और घर की जिम्मेदारियों की वजह से लोगों में काफी ज्यादा चिंता बनी रहती है, जिसके कारण वह काफी ज्यादा सोच लेते हैं और तनाव जैसी समस्या से पीड़ित हो जाते हैं। हालांकि, आपकी जानकारी के लिए आपको बता दें, कि ओवरथिंकिंग करना मतलब कि किसी बात को लेकर हद से ज्यादा सोचना भी एक समस्या है। यह समस्या लोगों में काफी ज्यादा आम देखी जा सकती है। दरअसल, इस समस्या से आज तक कोई भी नहीं बच पाया है, क्योकि किसी भी चीज का डर, काम और जिम्मेदारियों के चलते यह समस्या एक व्यक्ति पर हावी हो सकती है, जो कि इस तरह की स्थिति में काफी आम होता है। इसलिए, आज के समय में ओवरथिंकिंग एक आम समस्या बनती जा रही है, जिससे दुनिया में आधे से भी ज्यादा लोग हर वक्त इस समस्या से घिरे रहते हैं। दरअसल, इस समस्या के दौरान किसी भी बात को लेकर एक व्यक्ति जरूरत से कई ज्यादा सोचने लग जाता है, जिससे कि उसकी मानसिक सेहत पर काफी ज्यादा बुरा प्रभाव पड़ता है, जो सम्पूर्ण स्वास्थ्य के लिए बिल्कुल भी ठीक नहीं होता है। दरअसल, यह समस्या किसी भी व्यक्ति को और कहीं पर भी प्रभावित कर सकती है। किसी भी बात को लेकर हद से ज्यादा सोचना और उसके साथ- साथ तनाव होना ही ओवर थिंकिंग कहलाता है। 

        दरअसल, किसी महत्वपूर्ण बात को लेकर सोच विचार और सलाह करना कहीं न कहीं बहुत जरूरी होता है, पर इसके संबंध में हद से ज्यादा सोचना और सोचते ही रहना आपके लिए एक बड़ी परेशनी बन सकती है। आम तौर पर, यह समस्या धीरे- धीरे लोगों में एक मानसिक बीमारी का रूप धारण कर रही है, जो न केवल शारीरिक बीमारी का कारण बनती है, बल्कि हमारे दिमाग के लिए भी ज्यादा ठीक नहीं होती है। ओवरथिंक करने के आपको कई संकेत मिल सकते हैं, जिसमें छोटी-छोटी बातों पर बार-बार सोचते रहना, गुजरे हुए पलों को बार-बार याद करना या फिर अपने आने वाले वक्त के बारे में लगातार सोचते रहना जैसे संकेत शामिल हो सकते हैं। 

        आम तौर पर, हम में ज्यादातर लोग ओवर थिंकिंग को एक आम समस्या समझ लेते हैं, जो हमारे जीवन को धीरे-धीरे नष्ट कर देती है। इससे हमारे दिमाग पर एक गहरा प्रभाव पड़ता है। ओवरथिंकिंग न केवल मानसिक सेहत को प्रभावित करती है, बल्कि यह हमारे दिमाग को लगातार तनाव जैसी स्थिति में रखता है। इससे कई तरह की समस्याएं हो सकती हैं, जिसमें मानसिक थकान होना, फैसला करने की शक्ति में कमी होना, नकारात्मकता में बढ़ोतरी होना और एकाग्रता में कमी होना जैसी कई तरह की दिक्क्तों का सामना करना शामिल हो सकता है। इसके इलावा, यह तनाव डिप्रेशन, नींद की कमी और लगातार सिर दर्द होना जैसी सामसायों का भी कारण बनता है। इससे दिमाग के काम करने की शक्ति बुरी तरीके से प्रभावित हो जाती है। इससे बचने के लिए इस पर ध्यान देना और इसे कम करने के लिए हर वो संभव कदम उठाना, जो इसको कम करने में आपकी काफी ज्यादा सहायता कर सकता है। आइये इस लेख के माध्यम से इसके बारे में इस के डॉक्टर से और विस्तार से जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। 

        ओवरथिंकिंग की शुरुआत कब होती है?

        आम तौर पर, ओवरथिंकिंग की शुरुआत तब होती है, जब हमारा दिमाग किसी एक ही चीज पर अटक जाता है और उसके बारे में ही बार-बार सोचता रहता है। इस दौरान इससे बाहर निकलना उसे काफी ज्यादा मुश्किल लगता है, इसलिए वह इस के बारे में सोचता रहता है और दिमाग से जुड़ी तरह-तरह की समस्याओं का शिकार हो जाता है। दरअसल, इस तरह की स्थिति एक व्यक्ति की मानसिक थकान का एक बहुत कारण बन सकती है। 

        ओवर थिंकिंग का दिमाग पर क्या असर पड़ता है?

        ओवरथिंकिंग से हमारा दिमाग काफी ज्यादा प्रभावित हो जाता है, इसमें कोई शक नहीं है। इससे दिमाग पर पड़ने वाले प्रभाव निम्नलिखित अनुसार हो सकते हैं, जैसे कि 

        1. दिमाग को बिल्कुल भी आराम न मिलना। 
        2. दिमाग में हर वक्त कुछ न कुछ चलते रहना। 
        3. ओवरथिंकिंग से स्ट्रेस हार्मोन बढ़ने पर दिमाग की कार्यक्षमता प्रभावित होना। 
        4. किसी भी चीज पर ध्यान केंद्रित करने में काफी परेशानी महसूस होना। 
        5. दिमागी याददाश्त का प्रभावित होना। 
        6. एकाग्रता में कमी आना। 
        7. निर्णय लेने की क्षमता कम होना। 
        8. नींद का बुरी तरीके से प्रभावित होना 
        9. चिड़चिड़ापन और तनाव का बढ़ना। 
        10. तनाव और डिप्रेशन का खतरा बढ़ना। 

        ओवर थिंकिंग को कैसे कंट्रोल किया जा सकता है? 

        ओवर थिंकिंग पर नियंत्रण पाने के लिए आप निम्नलिखित तरीकों को अपना सकते हैं, जैसे कि 

        1. रोजाना अपने विचारों को लिखना दिमाग को एक अलग सी शांति प्रदान करता है। 
        2. हर रोज कुछ वक्त अपने लिए निकालें और मेडिटेशन करें।
        3. मोबाइल और सोशल मीडिया से थोड़ी दुरी बना कर रखें। 
        4. अपनी नींद पूरी लें। 
        5. ओवर थिंकिंग में होने वाले तनाव को कम करने के लिए प्राणायाम और योग का सहारा लें। 

        निष्कर्ष : कुल मिलाकर, ओवरथिंकिंग एक आम समस्या है, जो दिमाग और शरीर पर असर डालती है। ओवरथिंकिंग के कारण एक व्यक्ति को शरीर और दिमाग से जुड़ी कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जो उसके पुरे जीवन को बर्बाद करके रख सकती है। इसके कारण नींद न आना, तनाव और डिप्रेशन होना, मानसिक थकान होना, फैसला करने की शक्ति में कमी होना जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। इन तमाम समस्याओं से अपना बचाव करने के लिए ओवर थिंकिंग पर ध्यान देते हुए उस पर कंट्रोल पाना ही बेहतर होता है। ओवर थिंकिंग को कम करने के लिए एक अच्छी डाइट का सेवन करें और इसके अलावा, मेडिटेशन करना भी बहुत जरूरी होता है। समस्या गंभीर लगने पर आप तुरंत पाने डॉक्टर से इसके बारे में बात कर सकते हैं। इस के बारे में ज्यादा जानकारी प्राप्त करने के लिए और ओवरथिंकिंग जैसी दिमाग से जुड़ी तरह-तरह की समस्याओं का तुरंत समाधान पाने के लिए आप ही न्यूरो सिटी हॉस्पिटल के विशेषज्ञों से संपर्क कर सकते हैं।

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          What Can Make Facial Tics Worse? Here Are Its Triggering Factors
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          What Can Make Facial Tics Worse? Here Are Its Triggering Factors

          • August 17, 2026

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          What Are The Two Distinct Forms Of Autism? Read To Know
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          • August 6, 2026

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          Autism is a complex neurodevelopmental condition that affects behaviour, communication, social interaction…

          क्या वाकई अनार और मिर्च का सेवन बचा सकता है आपको पार्किन्संस रोग से? डॉक्टर से जानें इसके बारे में!

          बढ़ती उम्र के कारण लोगों को कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। जिसमें पार्किंसंस बीमारी भी शामिल होती है। दरअसल, आपकी जानकारी के लिए आपको बता दें, कि पार्किंसंस रोग एक इस तरह की समस्या है, जो एक इंसान की जीवन शैली को काफी ज्यादा प्रभावित कर देती है। यह बीमारी एक इंसान के बुढ़ापे को काफी ज्यादा दिक्क्त में डाल देती है। ऐसे में, कई लोग सोचने लग जाते हैं, कि यह बीमारी फिर बुजुर्ग लोगों को ही होती है, पर ऐसा बिल्कुल भी नहीं है, कि यह बीमारी सिर्फ बुढ़ापे में ही आके तंग करती है, बल्कि यह बीमारी किसी भी उम्र में हो सकती है और किसी को भी तंग कर सकती है। इस तरह की बीमारियों का पता चलते ही आपको तुरंत अपने डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। ज्यादा दिनों तक नज़रअंदाज करने पर यह समस्या सेहत के लिए हानिकारक भी साबित हो सकती है। 

          आम तौर पर, आज के समय में हर इंसान चाहता है, कि वो सेहतमंद रहे और उसको किसी भी तरह कि बीमारी का सामना न करना पड़े, चाहे वो पार्किन्संस रोग हो या फिर कोई अन्य बीमारी। दरअसल, किसी भी तरह की समस्या से बचने के लिए लोग न जाने कितने ही उपायों का इस्तेमाल करते हैं, या फिर वो समस्या पर ध्यान ही नहीं देते हैं, जो सेहत के लिए बिल्कुल भी ठीक नहीं होता है। आम तौर पर, अगर आप किसी भी तरह की समस्या से अपना बचाव करना चाहते हैं, तो इसके लिए डेली लाइफ में खाने पीने वाली चीजों के ऊपर ध्यान देने कि काफी ज्यादा जरूरत होती है। डॉक्टर के अनुसार, रोजाना खाने -पाने वाली चीजें न केवल आपको शारीरिक तौर पर मजबूती प्रदान करती हैं, बल्कि आपको कई तरह की समस्याओं से भी बचाने में मदद प्रदान करती हैं। इसलिए, समस्या से बचने के लिए आपको सबसे पहले अपने खान पान को ही बदलना होता है। अगर रोजाना संतुलित भोजन का सेवन किया जाये तो इस तरह की समस्या से अपना बचाव किया जा सकता है। 

          दरअसल, आपकी जानकारी के लिए आपको बता दें, कि पार्किन्संस जैसी समस्या को लेकर कोई न कोई रिसर्च होती ही रहती है, जिस में अनार और मिर्च के सेवन से पार्किन्संस रोग से अपना बचाव किया जा सकता है। अब ऐसे में कई लोग जानना चाहते हैं, कि क्या वाकई अनार और मिर्च के सेवन से पार्किन्संस रोग से अपना बचाव किया जा सकता है? दरअसल, आपको बता दें, कि अनार और मिर्च का सेवन आपको पार्किंसंस बीमारी से पूरी तरीके से नहीं बचा सकता है, पर हाँ शोध के अनुसार, इनका सेवन पार्किंसंस बीमारी के जोखिम को कम करने में आपकी काफी ज्यादा सहायता कर सकता है, क्योंकि इन में न्यूरोप्रोटेक्टिव जैसे कई तरह के गुण मौजूद होते हैं। आम तौर पर, मिर्च में पाए जाने वाले निकोटीन और अनार में पाए जाने वाले एंटीऑक्सीडेंट दरअसल, दिमाग के सेल्स को सुरक्षित रखने में आपकी काफी ज्यादा सहायता करते हैं। हालांकि, अगर आप अपनी सेहत का ख्याल रखना चाहते हैं, तो आपको अपनी डाइट में आनर और मिर्च के सेवन के बारे में जरूर जानकारी लेनी चाहिए। यह इस रोग को कम करने में सहायक हो सकते हैं। आइये इस लेख के माध्यम से इसके बारे में इस के डॉक्टर से और विस्तार से जानकारी प्राप्त करते हैं। 

          अनार पार्किंसंस बीमारी से कैसे बचा सकता है?

          आम तौर पर, उन लोगों में पार्किंसंस रोग होने की संभावना काफी ज्यादा होती है, जो ब्लड प्रेशर जैसी समस्या से जूझ रहे होते हैं। और वहीं अनार में मौजूद टैनिन, पॉलिफिनॉल्स और एंटीऑक्सीडेंट्स जैसे कई तरह के गुण ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल को कम करने में काफी ज्यादा सहायता करते हैं। इसके अलावा, अनार में पर्याप्त मात्रा में विटामिन भी पाया जाता है, जो न केवल एक व्यक्ति के तंत्रिका तंत्र को पोषण प्रदान करता है, बल्कि इससे पार्किन्संस रोग से अपना बचाव भी किया जा सकता है। इसलिए, पार्किन्संस रोग से बचने के लिए अनार का सेवन लाभदायक होता है। 

          मिर्च पार्किंसंस बीमारी से कैसे बचा सकती है?

          दरअसल, जर्नल एनल्स ऑफ न्यूरोलॉजी में प्रकाशित एक शोध के अनुसार, मिर्च के सेवन से पार्किंसंस रोग की सम्भावना को कम किया जा सकता है। शोध के अनुसार, मिर्च में पाया जाने वाला निकोटीन पार्किन्संस रोग के लिए काफी ज्यादा फायदेमंद होता है। 

          निष्कर्ष :अनार और मिर्च का सेवन पूरी तरीके से पार्किंसंस बीमारी को रोक नहीं सकता, पर इन में पाए जाने वाले न्यूरोप्रोटेक्टिव गुण इस समस्या के जोखिम को काफी हद तक कम कर सकते हैं। मिर्च में पाया जाने वाला निकोटीन और अनार में पाए जाने वाले एंटीऑक्सीडेंट ब्रेन सेल्स को बचाने में आपकी काफी ज्यादा मदद कर सकते हैं। पार्किंसंस बीमारी कोई लाइलाज बीमारी नहीं है, पर इस समस्या का इलाज इतना आसान भी नहीं है। इसलिए, समस्या पर समय रहते ध्यान देना बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। इस के लिए आप अपनी डाइट में अनार और दूसरों फलों के सेवन को शामिल करके अपने तंत्रिका तंत्र को मजबूत कर बना सकते हैं। इस बात से यह तय होता है, कि अनार और मिर्च के सेवन से पार्किंसंस रोग के खतरे को कम किया जा सकता है। इसके बारे में ज्यादा जानकारी प्राप्त करने के लिए और दिमाग से जुड़ी किसी भी तरह की समस्या का समाधान पाने के लिए आप आज ही न्यूरो सिटी हॉस्पिटल में जाकर इसके विशेषज्ञों से इसके बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

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            What Can Make Facial Tics Worse? Here Are Its Triggering Factors
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            What Can Make Facial Tics Worse? Here Are Its Triggering Factors

            • August 17, 2026

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            What Causes Persistent Motor And Vocal Tics In People? 
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            • August 11, 2026

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            What Are The Two Distinct Forms Of Autism? Read To Know
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            What Are The Two Distinct Forms Of Autism? Read To Know

            • August 6, 2026

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            Autism is a complex neurodevelopmental condition that affects behaviour, communication, social interaction…

            क्या आपका दिमाग भी थोड़ा सा काम करते ही थक जाता है? डॉक्टर से जानें, इससे राहत पाने के आसान उपायों के बारे में!

            दरअसल, आज की तेज रफ़्तार भरी जिंदगी में लोग रोज एक ही काम करते -करते थक जाते हैं और वो इससे काफी ज्यादा परेशान और काफी ज्यादा थकान महसूस करने लग जाते हैं। इसके अलावा, इसकी वजह से कई लोग छोटे-छोटे काम करने में भी दिमागी थकान महसूस करने लग जाते हैं। जिसमें मोबाइल या फिर कंप्यूटर पर ईमेल वगैहरा चेक करना या फिर घर में कपड़ों को तह मरना जैसे काम शामिल हो सकते हैं। दरअसल, आपकी जानकारी के लिए आपको बता दें, कि अक्सर छोटे-छोटे काम करके ही दिमागी थकान महसूस करना कोई आलस नहीं होता है, बल्कि यह आपकी दिमागी थकान का एक बहुत बड़ा संकेत होता है, जिसका उत्पादन तब होता है, जब आपके दिमाग की ऊर्जा जल्दी खत्म होनी शुरू हो जाती है। 

            दरअसल, डॉक्टर का इस पर कहना है, कि यह कोई आलस की समस्या नहीं होती है, बल्कि माहवारी के बाद इस तरह के मामलों में काफी ज्यादा बढ़ोतरी देखी गई है, जो आम तौर पर, नींद में होने वाली कमी, लंबे समय के तनाव, चिंता, वर्कआउट में कमी और यहां तक कि थायराइड जैसी दिक्कतों से जुड़ी हुई होती है। आम तौर पर हम में से कई लोग इस तरह की स्थिति को आलस या फिर आम समझ कर नज़रअंदाज कर देते हैं, जो आगे चलकर या फिर लगातार बनी रहने पर दिमाग के लिए काफी ज्यादा नुकसानदायक साबित हो सकती हैं। ऐसे में, दिमागी थकान होने जैसी स्थिति के कई लक्षण आपको महसूस हो सकते हैं, जिसमें हर छोटे-से -छोटे काम को टालते रहना, काफी ज्यादा चिड़चिड़ापन महसूस करना और साथ में अचानक से दिमाग का बंद होना जैसे सब कुछ शटडाउन हो जाना जैसा महसूस हो सकता है। इस तरह की स्थिति होने पर आप तुरंत अपने डॉक्टर से संपर्क कर सकते हैं, या फिर एक अच्छी बात यह भी हो सकती है, कि इस तरह की स्थिति से राहत पाने के लिए आप कुछ उपायों का भी इस्तेमाल कर सकते हैं, जिसमें सबसे पहले अपनी नींद को प्राथमिकता देना, 90 से 20 रूल को अपनाना, दिमाग को सही फ्यूल देना, अपने आसपास हलचल रखना और साथ में डिजिटल डिटॉक्स और बाउंड्री सेट करना जैसे उपाय शामिल हो सकते हैं। आम तौर पर, इन उपायों का इस्तेमाल करके आप अपनी मानसिक ताकत को वापिस पा सकते हैं और अच्छी जिंदगी बिता सकते हैं। आइये इस लेख के माध्यम से इसके बारे में इस के डॉक्टर से और विस्तार से जानकारी प्राप्त करते हैं। 

            1. नींद को प्राथमिकता देना 

            इस तरह किस स्थिति से बचने के लिए रोज एक आरामदायक और सात से नौ घंटे की नींद लेना बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण होता है, इससे न केवल शरीर ठीक रहता है, बल्कि दिमाग की स्थिति भी ठीक रहती है। आम तौर पर, सोने से पहले रूटीन सेट करें, जिस में नींद लेने से पहले अपने कमरे की लाइट को बिल्कुल कम करना, मोबाइल और टीवी की स्क्रीन से दूर रहना और साथ में कैमोमाइल जैसी हर्बल ड्रिंक का सेवन करना शामिल हो सकता है। अमेरिकन एकेडमी ऑफ स्लीप मेडिसिन के मुताबिक, एक व्यक्ति की नींद में कमी होने पर दिमाग का फ्रंट हिस्सा बिल्कुल भी ठीक से काम नहीं कर पाता है, जिसकी वजह से छोटे- छोटे काम करने पर भी काफी ज्यादा दिक्कत महसूस होती है। इसलिए, सबसे पहले अपनी नींद को पूरा करना बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। 

            1. 90 से 20 रूल को अपनाना 

            आम तौर पर, इस तरह की स्थिति से राहत पाने के लिए आप 90 से 20 के रूल को अपना सकते हैं। इससे आप काफी ज्यादा रिलेक्स फील कर सकते हैं और अपने काम को भी अच्छे तरीके से कर सकते हैं। दरअसल, इस नियम के मुताबिक कम से कम 90 मिनट तक काम करें और फिर लगभग 20 मिनट तक का ब्रेक लें। इस दौरान ब्रेक में कहीं बाहर टहलें, गहरी सांस लें, या फिर कोई हल्का संगीत सुने, जिससे आपको राहत मिलती हो और दिमाग को शांति प्राप्त होती हो। आम तौर पर, ऐसा करने पर स्‍ट्रेस हार्मोन बढ़ने से काफी ज्यादा बचाव होता है और साथ में दिमाग में मोटिवेशन बना रहता है।

            1. दिमाग को सही फ्यूल देना 

            दरअसल, अगर आप भी किसी भी काम को करते वक्त दिमागी थकान महसूस करते हैं, तो इस दौरान अपने दिमाग को सही फ्यूल देना बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। आमतौर पर, आपकी जानकारी के लिए आपको बता दें, कि मानसिक थकान की शुरुआत अक्सर ब्लड शुगर के गिरने की वजह से होती है। इस तरह की स्थिति में, हर तीन से चार घंटे में संतुलित स्नैक्स का सेवन करें, जिसमें साबुत अनाज वाले टोस्ट पर एवोकाडो या फिर दही के साथ नट्स का सेवन करना शामिल हो सकता है। इस तरह की समस्या से राहत पाने के लिए हर रोज तकरीबन दो से तीन लीटर तक पानी का सेवन करें और ओमेगा-3 से भरपूर आहार का सेवन करें। ऐसा करने पर न केवल दिमागी सूजन कम होती है, बल्कि इससे दिमाग की थकान भी काफी दूर हो जाती है। इसलिए, रोजाना इन का सेवन करना दिमाग के लिए काफी ज्यादा फायदेमंद साबित होता है।

            निष्कर्ष: दिमागी थकान को दूर करने के लिए और दिमाग को पहले जैसा सेहतमंद बनाने के लिए आप इन उपायों का इस्तेमाल कर सकते हैं। आखिरकार नियमितता से ही तो ताकत वापस आती है और दिमाग लचीला बनता है। सही तरीकों का इस्तेमाल करके ही तो आप छोटे-छोटे कामों को आसानी से कर पाएंगे। इन उपायों का इस्तेमाल करने के बाद भी अगर दिमाग थकान में किसी भी तरह का कोई भी प्रभाव न दिखे, तो आपको तुरंत अपने डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। इसके बारे में ज्यादा जानकारी प्राप्त करने के लिए और दिमाग से जुड़ी किसी भी तरह की समस्या का समाधान पाने के लिए आप आज ही न्यूरो सिटी हॉस्पिटल में जाकर अपनी अपॉइंटमेंट को बुक करवा सकते हैं और इसके विशेषज्ञों से इसके बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

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              What Can Make Facial Tics Worse? Here Are Its Triggering Factors
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              • August 11, 2026

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              पैदल चलने से पीठ दर्द को कौन से लाभ प्राप्त हो सकते हैं? डॉक्टर से जानें इसके बारे में!

              आज के समय में लोगों में हड्डियों से जुड़ी तरह-तरह की समस्याओं का होना काफी ज्यादा आम हो गया है। ऐसे में, पीठ में दर्द होना भी काफी ज्यादा आम है। दरअसल, आपकी जानकारी के लिए आपको बता दें, कि शरीर से जुड़ी ऐसी कई तरह की समस्याएं हैं, जिनका होना काफी ज्यादा आम होता है। ऐसे ही, लगभग दुनिया भर में पीठ दर्द होना सबसे आम सेहत समस्याओं में से एक है, जो किसी भी उम्र के लोगों पर अपना बुरा प्रभाव डाल सकती है। आम तौर पर, एक व्यक्ति के पीठ में दर्द होने के कई कारण हो सकते हैं, जिसमें एक व्यक्ति का काफी लंबे वक्त तक एक ही जगह पर बैठे रहना, कोई भी कसरत न करना, ज्यादा देर तक झुक कर बैठे रहना, गलत मुद्रा या फिर गतिहीन जीवनशैली का होना जैसे कारण शामिल हो सकते हैं। हालांकि, इस तरह की समस्या से छुटकारा पाने के लिए अक्सर डॉक्टरों द्वारा दवाएं, फिजियोथेरेपी और रोजाना आराम करने की सलाह को प्रदान किया जाता है। पर, कुछ लोग इन के चलते इस समस्या से छुटकारा पाने के एक आसान और एक आरामदायक उपाय को नज़रअंदाज कर देते हैं, जो कि पैदल चलना होता है। 

              आम तौर पर, इसके बारे में सभी जानते हैं, कि पैदल चलना न केवल हमारी सेहत के लिए बेहतर होता है, बल्कि इससे कई तरह की बीमारियां भी ठीक हो जाती हैं। दरअसल, इस तरह की स्थिति में, बहुत से लोग जानना चाहते हैं, कि क्या वाकई पैदल चलने से पीठ दर्द ठीक होता है और पैदल चलने से पीठ दर्द को कौन-कौन से लाभ प्राप्त हो सकते हैं? दरअसल, इस पर डॉक्टर का कहना है, कि अगर कोई व्यक्ति रोजाना पैदल चलता है, तो उसके शरीर की मुद्रा, लचीलेपन और मांसपेशियों की ताकत में काफी ज्यादा सुधार देखा जाता है, जिससे उसकी पीठ में होने वाला दर्द काफी ज्यादा कम हो जाता है। इसके साथ ही, पैदल चलने से पीठ दर्द को कई तरह के लाभ प्राप्त होते हैं, जिस में रक्त संचार में काफी सुधार होना, कमर और पीठ की मांसपेशियों को मजबूती देना, शारीरिक मुद्रा में सुधार होना, कठोरता को कम करना, मूड और दर्द सहने की क्षमता में सुधार करना जैसे लाभ शामिल हो सकते हैं। पैदल चलने से शरीर को कई तरह के लाभ प्राप्त हो सकते हैं, इस में किसी भी तरह का कोई भी शक नहीं है। आइये इस लेख के माध्यम से इस के बारे में इस के डॉक्टर से और विस्तार से जानकारी प्राप्त करते हैं। 

              पैदल चलने और पीठ के स्वास्थ्य के बीच संबंध

              दरअसल, आपकी जानकारी के लिए आपको बता दें, कि नियमित चलना एक एरोबिक व्यायाम है, जो शरीर में शॉक को कम करता है। रोजाना पैदल चलना न केवल आपके शरीर में ब्लड सर्कुलेशन को बेहतर बनाने का काम करता है, बल्कि यह एक व्यक्ति के मसल्स को भी मजबूत करता है और शरीर में लचीलेपन को बढ़ाता है। डॉक्टर के अनुसार, पैदल चलने से रीढ़ की हड्डी को गतिशील करने और पोस्चर को बेहतर बनाने में काफी ज्यादा सहायता प्राप्त हो सकती है। दरअसल, यह आपकी पीठ को सहारा देने वाली मसल्स को मजबूत करने में काफी ज्यादा मदद करता है, जिसमें कोर, हिप्स और पैर शामिल होते हैं। इसकी वजह से पीठ के निचले हिस्से पर पड़ने वाला प्रेशर काफी ज्यादा कम हो जाता है। 

              पैदल चलने से पीठ दर्द को मिलने वाले लाभ!

              आम तौर पर, पैदल चलने से पीठ दर्द को कई लाभ प्राप्त हो सकते हैं, जिसमें से कुछ निम्नलिखित अनुसार हो सकते हैं, जैसे कि 

              1. रक्त संचार में सुधार होना 

              दरअसल, आप यह जानते ही होंगे, कि पैदल चलना शरीर में ब्लड सर्कुलेशन को बढ़ाने का एक शानदार तरीका हो सकता है। आम तौर पर, यह रीढ़ की हड्डी के ऊतकों तक ऑक्सीजन और पोषण को पहुंचाने में काफी ज्यादा सहायता प्रदान कर सकता है। दरअसल, इससे उपचार प्रक्रिया बढ़ती है और शरीर की सूजन काफी ज्यादा कम हो जाती है। 

              1. कमर और पीठ की मांसपेशियों को मजबूत करना 

              आम तौर पर, एक व्यक्ति का नियमित पैदल चलना एक मजबूत कोर रीढ़ को सहारा प्रदान करता है और इसकी वजह से पीठ के निचले हिस्से पर किसी भी तरह का कोई भी भारी दबाव नहीं पड़ता है। दरअसल, एक आम तरीके से पैदल चलने से पेट और

              पीठ के निचले हिस्से की मसल्स एक्टिव रहती हैं। नियमित, पैदल चलना शरीर और सेहत दोनों के लिए काफी ज्यादा लाभदायक होता है। 

              1. मनोदशा और दर्द सहन करने की क्षमता में सुधार करना 

              आम तौर पर, अगर एक व्यक्ति रोजाना पैदल चलता है, तो उसके शरीर में एक एंडोर्फिन हार्मोन निकलता है, जिसको एक प्राकृतिक पेन रिलीवर माना जाता है। दरअसल, यह न केवल एक व्यक्ति के मूड को बेहतर करता है, बल्कि यह दर्द के एहसास को कम करने में भी काफी ज्यादा सहायता प्रदान करता है। 

              निष्कर्ष: कुल मिलाकर पैदल चलना न केवल हमारे शरीर की सेहत के लिए बेहतर होता है, बल्कि इस से कई तरह की बीमारियां भी कम हो जाती हैं। पीठ की हेल्थ को बेहतर बनाने के लिए सबसे आसान और सबसे असरदार और आसानी से मिलने वाले तरीकों में से एक पैदल चलना। यह सभी तरह के पीठ दर्द को तो ठीक नहीं करता, पर यह शरीर की अकड़न को कम करने और मसल्स को मजबूत बनाने आदि में मदद करता है। पीठ दर्द से प्राकृतिक रूप से छुटकारा पाने के लिए नियमित रूप से चलना, सही मुद्रा और स्वस्थ जीवन शैली को अपनाना जैसी आदतों को अपना सकते हैं। पीठ दर्द से जुड़ी गंभीर समस्या होने पर आप तुरंत अपने डॉक्टर से संपर्क कर सकते हैं। इस के बारे में ज्यादा जानकारी प्राप्त करने के लिए और पीठ दर्द से जुड़ी किसी भी तरह की समस्या का तुरंत समाधान पाने के लिए आप आज ही न्यूरो सिटी हॉस्पिटल में जाकर अपनी अपॉइंटमेंट को बुक करवा सकते हैं और इस के विशेषज्ञों से इस के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

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                क्या डीप ब्रेन स्टिमुलेशन सर्जरी डिप्रेशन के मरीजों के लिए कारगर होती है? डॉक्टर से जानें इसके बारे में !

                आज की व्यस्त जीवनशैली के कारण लोगों को सेहत के साथ जुड़ी कई तरह की समस्याएं तो होती ही हैं, पर इससे दिमाग भी बुरी तरीके से प्रभावित हो जाता है। दरअसल, दिमाग से जुड़ी तरह- तरह की समस्याओं के कारण लोगों को अपने जीवन में बहुत सी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। आम तौर पर, ज्यादातर दिमाग से जुड़ी बीमारियों में इंसान अपने रोज के काम करने में भी काफी ज्यादा दिक्कत महसूस करने लग जाता है। दरअसल, आपकी जानकारी के लिए आपको बता दें, कि डीप ब्रेन स्टिमुलेशन एक तरीके की सर्जिकल प्रक्रिया होती है, जिसकी सहायता से पार्किंसंस डिजीज, डिप्रेशन और मिर्गी जैसी समस्याओं के लक्षणों को कम किया जा सकता है। आम तौर पर, डीप ब्रेन स्टिमुलेशन सर्जरी के दौरान दिमाग से जुड़ी किसी भी तरह की समस्या के दौरान मरीज के दिमाग में इलेक्ट्रोड लगाए जाते हैं, जो इलेक्ट्रिक तरंगों के माध्यम से एक व्यक्ति के दिमाग में होने वाले न्यूरोलॉजिकल विकारों को कम करने में काफी ज्यादा सहायता प्रदान करते हैं। ऐसे में, डीप ब्रेन स्टिमुलेशन सर्जरी वाकई डिप्रेशन के मरीजों के लिए काफी ज्यादा कारगर साबित होती है। इसी के चलते मेंटल हेल्थ के मरीजों का इलाज डीप ब्रेन स्टिमुलेशन सर्जरी के माध्यम से किया जा सकता है। आइये इस लेख के माध्यम से इस के बारे में इस के डॉक्टर से और विस्तार से जानकारी प्राप्त करते हैं। 

                डीप ब्रेन स्टिमुलेशन सर्जरी क्या है?

                दरअसल, इस पर डॉक्टर का कहना है, कि डीप ब्रेन स्टिमुलेशन एक न्यूरो सर्जरी है, जिसकी सहायता से दिमाग से जुड़ी कई तरह की समस्याओं का इलाज किया जाता है। हालांकि, यह सर्जरी केवल न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर से पीड़ित लोगों के लिए ही इस्तेमाल की जाती है। आम तौर पर, जब दिमाग के किसी विशेष हिस्से में इलेक्ट्रिकल प्रतिक्रियाएं काफी ज्यादा बढ़ जाती है, तो इस तरह की स्थिति में पीड़ित व्यक्ति को मूवमेंट डिसऑर्डर होने का जोखिम काफी ज्यादा बढ़ जाता है। असल में, इस दौरान व्यक्ति पार्किंसंस डिजीज या फिर टॉरेट सिंड्रोम जैसी समस्याओं का शिकार हो सकते हैं। हालांकि, पार्किंसंस जैसी समस्या के दौरान एक व्यक्ति के हाथ पैर कांपने, लिखने में परेशानी, चलने में परेशानी, बोलने में दिक्कत और किसी भी तरह की शारीरिक मूवमेंट में कमी होना या फिर इसका ज्यादा होना जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। इसके अलावा, इस तरह की समस्या में व्यक्ति को अपनी मांसपेशियों में अकड़न और कंपकंपी जैसे लक्षण महसूस हो सकते हैं। दरअसल, आपकी जानकारी के लिए आपको बता दें, कि इस तरह की बीमारी किसी भी व्यक्ति को जन्म से या फिर दिमाग में कोई चोट लगने, दिमाग में इंफेक्शन होने और लंबे वक्त से किसी भी तरह की दवा का इस्तेमाल आदि करने की वजह से हो सकती है। आपको बता दें, कि डीप ब्रेन स्टीमुलेशन एक पीड़ित व्यक्ति के दिमाग में लगाकर और दिमाग के असामान्य इलेक्ट्रिक फंक्शन को कंट्रोल में किया जाता है। 

                डीबीएस में कौन- कौन से हिस्सों का इस्तेमाल किया जाता है?

                दरअसल, डीबीएस में बहुत से हिस्सों का इस्तेमाल किया जाता है, जो निम्नलिखित अनुसार हो सकते हैं, जैसे कि 

                1. लीड्स: इसे दिमाग के उन हिस्सों में लगाया जाता है, जिनमें एबनॉर्मल इलेक्ट्रिकल एक्टिविटी होती है।
                2. इंप्लांटेबल लीड्स जनरेटर : दरअसल, इस को कॉलरबोन के बिल्कुल पास लगाया जाता है।
                3. एंकर: आम तौर पर, यह दिमाग में लीड्स को हिलने से बचाने में काफी ज्यादा सहायता प्रदान करता है। 
                4. एक्सटेंशन लीड्स: यह एक इंसुलेटेड वायर की तरह होती है, जो दरअसल लीड्स को जनरेटर से जोड़ने का काम करता है।
                5. हैंड हैल्ड प्रोग्रामर डिवाइस: दरअसल, इस का इस्तेमाल विशेष तौर पर, डिवाइस को चलाने, पल्स जनरेट करके इलेक्ट्रिक सिग्नल को कंट्रोल करने के लिए किया जाता है।

                डीप ब्रेन स्टिमुलेशन सर्जरी किन मरीजों के लिए की जाती है? 

                आम तौर पर, डीप ब्रेन स्टिमुलेशन सर्जरी पार्किंसंस डिज़ीज़, डिप्रेशन, मिर्गी, एसेंशियल ट्रेमोर, ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर, डिप्रेशन और डिस्टोनिया जैसी बिमारियों से पीड़ित लोगों के लिए की जाती है। 

                निष्कर्ष: दिमाग से जुड़ी डेप्रेशन जैसी तरह- तरह की समस्याओं के कारण लोगों को अपने जीवन में बहुत सी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। डीप ब्रेन स्टिमुलेशन एक डिवाइस की तरह होता है, जिसमें इलेक्ट्रोड मौजूद होते हैं, जिनको पीड़ित व्यक्ति के दिमाग के अंदर लगाया जाता है और दिमाग के ज़रूरी हिस्सों में इलेक्ट्रिकल सिग्नल भेजा जाता है। डीप ब्रेन स्टिमुलेशन एक तरीके की सर्जिकल प्रक्रिया है, जिससे पार्किंसंस डिजीज, डिप्रेशन और मिर्गी जैसी समस्याओं को कम किया जाता है। यह बात सच है, कि डीप ब्रेन स्टिमुलेशन सर्जरी वाकई डिप्रेशन के मरीजों के लिए कारगर साबित होती है। वहीं इसका इस्तेमाल मेंटल हेल्थ के मरीजों को ठीक करने के लिए भी किया जाता है। डीप ब्रेन स्टिमुलेशन सर्जरी का इस्तेमाल सिर्फ़ न्यूरोलॉजिकल बीमारियों से परेशान लोगों के लिए ही किया जाता है। इसके बारे में ज्यादा जानकारी प्राप्त करने के लिए और दिमाग से जुड़ी डिप्रेशन जैसी किसी भी तरह की गंभीर समस्या का तुरंत समाधान पाने के लिए आप आज ही न्यूरो सिटी हॉस्पिटल में जाकर अपनी अपॉइंटमेंट को बुक करवा सकते हैं और इसके विशेषज्ञों से इस के इलाज के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

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                  क्या मिर्गी और चक्कर आने की समस्या का सामना कर रही हैं पाकिस्तानी अभिनेत्री नादिया जमील? डॉक्टर से जाने मिर्गी के कारण, लक्षण और इलाज के बारे में!

                  दरअसल, आपकी जानकारी के लिए आपको बता दें, कि नादिया जमील जो एक पाकिस्तानी अभिनेत्री हैं, जिन को पाकिस्तान में एक कमाल की हिम्मत वाली महिलाओं की मिसाल माना जाता है। आम तौर पर, इन दिनों वह साहसी योद्धा की तरह एक नहीं बल्कि दो- दो बीमारियों का सामना रही हैं। दरअसल, प्राप्त हुई एक रिपोर्ट के मुताबिक, टॉप एक्ट्रेस नादिया बच्चों की भलाई के लिए हमेशा से इंसानी कोशिशों में शामिल रही हैं और उन्होंने बहुत सी कामयाबियों और शोहरत को प्राप्त किया है। इसके अलावा, टेली फिल्म ‘बेहद’ में रोल निभाने वाली एक्ट्रेस एक बहुत ही कमाल की हिम्मत के साथ एक नहीं दो बीमारियों का डटकर सामना कर रही हैं। 

                  आम तौर पर, इस तरह की स्थिति को ध्यान में रखते हुए रिपोर्ट में कहा गया है, कि नादिया चक्कर आने और मिर्गी जैसी समस्या से पीड़ित हैं। हालांकि, मिर्गी और चक्कर आने जैसी समस्या आम है और यह कोई जानलेवा बीमारी नहीं है, पर इस तरह की स्थिति में दोनों बीमारियों का कॉम्बिनेशन उनके लिए मुश्किलों भरे हालातों को पैदा कर देता है, जिसकी वजह से रोजाना के कामकाज करना उनके लिए बहुत ही ज्यादा मुश्किल हो जाता है। 

                  आम तौर पर, लगभग इसके बारे में तो सभी जानते ही होंगे, कि इस पाकिस्तानी मशहूर एक्ट्रेस नादिया ने अपनी इस स्थिति के बारे में एक ट्वीट में बताते हुए कहा है, कि वह मिर्गी और चक्कर आने जैसी समस्या से काफी ज्यादा परेशान हैं। आम तौर पर, इस तरह की समस्या जीवन को खतरा पहुंचाने वाली समस्या नहीं, बल्कि यह जिंदगी को कभी -कभी बहुत ही ज्यादा चुनौतीपूर्ण बना देने वाली समस्या हो सकती है। हालांकि, इस दौरान चक्कर आना असल में काफी ज्यादा परेशान करने वाला होता है, क्योंकि इसके आस-पास का सब कुछ

                  अपने आप ही घूमने लग जाता है। इसकी वजह से ठीक से नींद न आने और एंग्जायटी होने जैसी समस्या का सामना करना पड़ता है। इसके अलावा इस तरह की स्थिति में रोशनी और तेज़ आवाज़ों से भी काफी ज्यादा डर लगता है, पर फिर भी सब कुछ अपने आप चलता रहता है।

                  नोट : दरअसल, इससे यह बात बिल्कुल स्पष्ट होती है, कि एक मशहूर पाकिस्तानी अभिनेत्री नादिया जमील जो मिर्गी और चक्कर आने जैसी समस्या का सामना कर रही हैं।

                  मिर्गी के लक्षण क्या होते हैं? 

                  वैसे तो, मिर्गी के बहुत से लक्षण होते हैं, पर इस में कुछ निम्नलिखित अनुसार हो सकते हैं, जैसे कि 

                  1. मरीज के शरीर का एक दम से अकड़ जाना। 
                  2. आंखों के आगे एक दम से अंधेरा छा जाना।
                  3. बेहोशी आना। 
                  4. पीड़त के मुंह से झाग निकलना। 
                  5. इस दौरान, अपने होंठ या फिर जीभ को काट लेना।
                  6. मरीज की आंखों की पुतलियों का अपने आप ऊपर की तरफ खिंच जाना।
                  7. बेहोश होकर या फिर आम अवस्था में अचानक से जमीन पर गिर जाना।
                  8. आपके दांतों को होठों के नीचे दबाकर भींचना। 

                  मिर्गी के कारण क्या होते हैं?

                  इस तरह की स्थिति में, अगर इसके कारणों और लक्षणों पर ध्यान दे दिया जाये तो इस समस्या की पहचान करना और इलाज करना काफी ज्यादा आसान हो जाता है। इसके कारणों में निम्नलिखित कारक शामिल हो सकते हैं, जैसे कि 

                  1. सिर पर गहरी चोट का लगना।
                  2. दिमाग का ट्यूमर होना। 
                  3. दिमागी बुखार होना। 
                  4. अल्जाइमर की बीमारी होना। 
                  5. परिवार में पहले से ही इस तरह की समस्या होना (जेनेटिक होना) 
                  6. ब्रेन स्ट्रोक होने पर भी मिर्गी जैसी समस्या हो सकती है।
                  7. बच्चे के जन्म के समय दिमाग में पर्याप्त रूप से ऑक्सीजन बिलकुल भी सप्लाई न होना। 
                  8. इंसेफेलाइटिस होने से भी दिमाग पर बुरा असर पड़ सकता है और मिर्गी की समस्या हो सकती है।

                  मिर्गी का इलाज कैसे होता है?

                  दरअसल, आपकी जानकारी के लिए आपको बता दें, कि इस तरह की समस्या का इलाज दवाओं से किया जा सकता है। हालांकि, दवाओं से मिर्गी जैसी समस्या के अटैक को बेहतर तरीके से कंट्रोल किया जा सकता है, पर इस समस्या के इलाज के लिए दूसरे विकल्प भी मौजूद हैं, जो डॉक्टरों द्वारा तय की गई दवाओं के काम न करने पर इस्तेमाल किये जा सकते हैं। इसके अलावा, मिर्गी का दौरा पड़ने पर मरीज को कोई भी जूता न सुंघाने के साथ -साथ मुँह में चम्मच न लगाएं। इस तरह की स्थिति में उसके कपड़ों को ढीला करें और इसके साथ ही हाथ और पैरों की मालिश और अकड़े हुए अंगों को सीधा करने का प्रयास न करें। 

                  निष्कर्ष: यह बात सच है, कि मशहूर पाकिस्तानी अभिनेत्री नादिया जमील मिर्गी और चक्कर आने जैसी समस्या का सामना कर रही हैं। मिर्गी की समस्या आम है, पर यह जानलेवा भी नहीं है, बस इससे निपटना कभी कभी बहुत ही ज्यादा मुश्किल हो जाता है। इस लेख के माध्यम से हमने आपको इस समस्या के लक्षणों और इसके कारणों के बारे में बताया है, जिनका उपचार किया जाना बिल्कुल संभव है। मिर्गी की गंभीर समस्या होने पर आपको तुरंत अपने डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। इसके बारे में ज्यादा जानकारी प्राप्त करने के लिए और मिर्गी जैसी दिमाग से जुड़ी किसी भी तरह की समस्या का समाधान पाने के लिये आप आज ही न्यूरो सिटी हॉस्पिटल में जाकर इसके विशेषज्ञों से इसके इलाज के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

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                    क्या मिर्गी का दौरा पड़ने पर इन चार घरेलू उपायों को अपनाना फायदेमंद हो सकता है? जानें डॉक्टर से

                    दरअसल, मिर्गी एक इस तरह की समस्या है, जिससे एक आम इंसान भी अचानक से काफी ज्यादा प्रभावित हो सकता है। आम तौर पर, मिर्गी की समस्या आम है, पर समय पर इलाज न मिलने पर यह आगे चलकर काफी ज्यादा गंभीर हो सकती है। मिर्गी यानी कि एपिलेप्सी जिसके होने पर एक व्यक्ति को न केवल अचानक से दौरा पड़ने लगता है, बल्कि वह इस दौरान बेहोश भी हो जाता है। दरअसल, आपकी जानकारी के लिए आपको बता दें, कि मिर्गी तंत्रिका तंत्र से जुड़ी एक गंभीर बीमारी है, जिसमें एक व्यक्ति को दौरा पड़ता है, तो वह अपने दिमाग के संतुलन को खो बैठता है। इसके अलावा, इस दौरान मरीज के हाथ पैर अकड़ने के साथ-साथ शरीर कांपने और ऐंठने लगता है। दरअसल, इलाज होने पर भी यह समस्या पूरी तरीके से ठीक नहीं होती है, यहां तक कि इस समस्या को दवाओं की मदद से कंट्रोल में रखा जाता है, पर दवाओं को बंद करने पर यह दौरे फिर से पड़ने लग जाते हैं। आम तौर पर, दवाओं के सेवन के अलावा भी आप कुछ घरेलू उपायों का इस्तेमाल करके इस तरह की समस्या को कंट्रोल में रख सकते हैं। इन घरेलू उपायों में सफेद प्याज का रस, शहतूत और अंगूर का रस, तुलसी और सीताफल के पत्तों का रस और करौंदा के पत्तों का सेवन शामिल हो सकता है। यह इस समस्या के लिए काफी ज्यादा फायदेमंद साबित हो सकते हैं। आइये इस लेख के माध्यम से इस के बारे में इस के डॉक्टर से और विस्तार से जानकारी प्राप्त करते हैं। 

                    दौरा पड़ने पर पीड़ित व्यक्ति के साथ क्या नहीं करना चाहिए?

                    1. समस्या से पीड़त व्यक्ति के मुंह में कुछ न डालें।
                    2. इस तरह की स्थिति में मरीज को कहीं पर भी ले जाने की कोशिश न करें। 
                    3. इस दौरान मरीज को पूरी तरीके से ठीक होने के बाद ही कुछ खिलाएं- पिलाएं। 
                    4. इस दौरान मिर्गी का उपचार आप खुद से करने की बिल्कुल भी कोशिश न करें।

                    मिर्गी का दौरा पड़ने पर अपनाये जाने वाले कुछ घरेलू उचार 

                    दरअसल, मिर्गी का इलाज खुद करने की बजाए, अच्छा होगा कि आप तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें और डॉक्टर से ही इसका इलाज करवाएं। अगर किसी भी तरह की स्थिति में आपको लगता है, की आप मिर्गी जैसी समस्या की चपेट में आ रहे हैं, या फिर परिवार में कोई व्यक्ति इस समस्या से पीड़ित है, तो आप इस दौरान उसके होश में आने पर, इन घरेलू उपचारों का इस्तेमाल कर सकते हैं, इन से किसी भी तरह का कोई साइड इफेक्ट नहीं होता है और पीड़ित व्यक्ति को इनसे समस्या से राहत मिल सकती है। यह उपचार निम्नलिखित अनुसार हो सकते हैं, जैसे कि 

                    1. सफेद प्याज का रस 

                    दरअसल, मिर्गी जैसी समस्या का समाधान करने के लिए आप मिर्गी के मरीज को रोजाना 1 चम्मच प्याज के रस का पीला सकते हैं। 

                    1. शहतूत और अंगूर का रस

                    इस समस्या के दौरान मरीज को रोजाना शहतूत और अंगूर के रस का सेवन करवाना भी काफी ज्यादा लाभदायक साबित हो सकता है। 

                    1. तुलसी और सीताफल के पत्तों का रस 

                    आम तौर पर, किसी भी व्यक्ति को मिर्गी का दौरा पड़ने पर उसकी नाक में तुलसी के रस में सेंधा नमक मिलाकर डालने से मरीज को काफी राहत मिल सकती है। इस दौरान तुलसी की जगह आप सीताफल के पत्तों का रस भी शामिल कर सकते हैं। 

                    1. करौंदा के पत्तों का सेवन 

                    दरअसल, करौंदे के पत्ते भी ,मिर्गी की समस्या के लिए काफी ज्यादा लाभदायक साबित हो सकते हैं। इसके लिए आप करौंदे के पत्तों को पीसकर इस की चटनी बनाकर मिर्गी से पीड़ित व्यक्ति को खिला सकते हैं। दरअसल, इस का रोजाना सेवन करने से पीड़ित व्यक्ति को जल्दी लाभ प्राप्त हो सकता है। 

                    निष्कर्ष: मिर्गी तंत्रिका तंत्र से जुड़ी एक बीमारी है, जिसमें दौरा पड़ने पर एक व्यक्ति का दिमागी तंतुलन काफी ज्यादा खराब हो जाता है। इस समस्या के दौरान न केवल मरीज के हाथ पैर अकड़ने लग जाते हैं, बल्कि इसमें पीड़ित व्यक्ति का शरीर कांपने और ऐंठने भी लग जाता है। इस दौरान व्यक्ति बेहोश हो जाता है। हालाँकि, इलाज मिलने पर भी ये समस्या पूरी तरीके से सही नहीं होती है। दवाओं से सिर्फ इस समस्या को कंट्रोल में किया जाता है, पर दवाओं को छोड़ने पर यह समस्या व्यक्ति को दुबारा से पेरशान कर सकती है। ऐसे में दवाओं का सेवन करने के साथ -साथ इस को कुछ घरेलू उपचारों का भी कंट्रोल में रखा जा सकता है, जिसमें सफेद प्याज का रस, शहतूत और अंगूर का रस, तुलसी और सीताफल के पत्तों का रस और करौंदा के पत्तों का सेवन शामिल हो सकता है। मिर्गी की गंभीर स्थिति बनने पर आप तुरंत अपने डॉक्टर से संपर्क कर सकते हैं। इसके बारे में ज्यादा जानकारी प्राप्त करने के लिए और मिर्गी जैसी समस्या से राहत पाने के लिए आप आज ही न्यूरो सिटी हॉस्पिटल में जाकर इसके विशेषज्ञों से इसके इलाज के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

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