मिर्गी के दौरे से जुड़े आठ ऐसे मिथ्स, जिसका जानना बेहद ज़रूरी है

मिर्गी का अटैक या दौरे बहुत ही  खतरनाक बीमारी है, जिससे पीड़ित व्यक्ति का शरीर बुरी तरह से अकड़ जाता है और मुँह से झाग निकलने लग जाता है | हलाकि कई लोग इस दौरे को भूत-प्रेत जैसे अंधविश्वास प्रक्रिया से भी जोड़ते है, जिसके कारण वह लोग मिर्गी से पीड़ित रोगी डॉक्टर के पास ले जाने के बजाये अन्धविश्वाश तांत्रिक या बाबाओं के पास ले जाना समझदारी मानते  है, उनका मानना यह होता है की मिर्गी पीड़ित पर कोई जिन या किसी चुड़ैल का साया आ गया है | इतना ही नहीं कई लोग मिर्गी पीड़ित रोगी को पागल तक करार देते है | कई लोग मिर्गी पीड़ित व्यक्ति को जुता सुंघा देते है या फिर मुँह में चाबी डाल देते है | आइए जानते है ऐसे ही कुछ मिर्गी के दौरे से जुड़े मिथ्स और फैक्ट्स जिसका जानना बेहद ज़रूरी है :- 

मिथ्स 1. मिर्गी पीड़ित का मानसिक असंतुलन होता है 

फैक्ट्स :-  यह बात बिल्कुल सच है , मिर्गी के दौरे व्यक्ति को मानसिक रूप से कमजोर कर देता है, जिसकी वजह से कई तांत्रिक कोशिकाएं कमजोर हो जाते है | हालांकि शरीर के बाकी अंग सामान्य ही रहते है, उन पर कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ता | 

लेकिन डॉक्टर स.के.बंसल, जो की न्यूरोसर्जरी एक्सपर्ट्स है उनका मानना है की  मिर्गी पीड़ित व्यक्ति को डॉक्टर के पास ले जाने में ही समझदारी है, क्योंकि यह दौरे मानसिक रूप से काफी हानि पहुंचा सकती है | आप इससे जुडी सलाह न्यूरोसिटी एक्सपर्ट टीम के डॉक्टर से भी ले सकती है, जो की न्यूरोलॉजी  स्पेशलिस्ट है |  

मिथ्स 2. मिर्गी पीड़ित रोगी का शरीर ऐंठने लग जाता है 

फैक्ट्स :-  मिर्गी के अटैक कई तरह के हो सकते है, हालांकि कई मामलों मिर्गी पीड़ित रोगी  का शरीर ऐंठने लगता है, परन्तु हर मामलो में ऐसा नहीं होता | 

मिथ्स 3. क्या मिर्गी की बीमारी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को जाती  है

फैक्ट्स :-  यह मिथ्स बिलकुल सही नहीं है, मिर्गी के बीमारी व्यक्ति से मानसिक संतुलन पर निर्भर करता है | क्योंकि यह दौरे उसी व्यक्ति को आते है, जिसके मस्तिष्क पर पहले से ही चोट लगी हो | 

मिथ्स 4. क्या मिर्गी के दौरे कभी भी आ सकते  है?

फैक्ट्स :- मिर्गी की दौरे तभी आते है जब व्यक्ति  की नींद पूरी ना हो,नशीली पदार्थ जैसे की शराब,तम्बाकू या धूम्रपान का सेवन किया है, जिसके कारण मानसिक संतुलन में परिवर्तन आता है और इसी वजह से मिर्गी के अटैक आते है | 

मिथ्स 5. क्या मिर्गी के रोगी दूसरे पर निर्भर होते  है ? 

फैक्ट्स :-  यह मिथ्स बिल्कुल सही है, क्योंकि मिर्गी पीड़ित व्यक्ति के परिजन और दोस्तों को उनकी हालत को समझना बेहद ज़रूरी है, जिससे उचित समय में मिले इलाज और सावधानियों से उन पर किसी भी तरह के  बुरा प्रभाव पड़ने से रोक सकती है |  

मिथ्स 6 . क्या मिर्गी के रोगी को शादी नहीं करना चाहिए  ? 

फैक्ट्स :-  यह मिथ्स बिल्कुल भी ठीक नहीं है, यह मामले सब से ज़्यादा महिलाओं में पाए जाते है | बल्कि उचित समय में इलाज से  मिर्गी पीड़ित व्यक्ति एक सामान्य जीवन जी सकता है | 

मिथ्स 7 . क्या मिर्गी पीड़ित महिला गर्भवती नहीं हो सकती ? 

फैक्ट्स:- मिर्गी के इलाज के लिए ले रही दवाइयां महिला की गर्भाशय को कोई नुकसान नहीं पहुंचाता , गर्भ अवस्था में  भी डॉक्टर के द्वारा बताए गए या उनकी देखरेख पर भी दवाइयां ले सकती है |  

मिथ्स 8 . क्या मिर्गी दौरे के समय रोगी को पकड़ लेना चाहिए ? 

फैक्ट्स:- मिर्गी के दौरे पड़ रहे व्यक्ति को कभी भी पकड़ना या दबाना नहीं चाहिए , बल्कि इस बात का ध्यान रखना चाहिए क़ी आस पास कोई नुकीली वस्तु या हानिकारक पदार्थ न हो |

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    सावधानियों को ध्यान में रख कर हम ब्रेन स्ट्रोक की समस्या से कैसे बचे ?

    आधुनिक जीवन की तेज़-तर्रार लय में, स्वास्थ्य अक्सर पीछे छूट जाता है। हालाँकि, हमारी भलाई की उपेक्षा करने से गंभीर परिणाम हो सकते है, जिनमें से सबसे खतरनाक मस्तिष्क स्ट्रोक का खतरा है। अच्छी खबर यह है कि सरल लेकिन प्रभावी सावधानियां अपनाने से इस जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है, तो जानते है की वह सावधानियां कौन-सी जो हमें ब्रेन स्ट्रोक के खतरे से बचा सकते है ; 

    ब्रेन स्ट्रोक में किन सावधानियों का रखें ध्यान ?

    • सबसे पहले, स्वस्थ जीवनशैली बनाए रखना मस्तिष्क स्ट्रोक को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। नियमित व्यायाम, यहां तक कि दिन में 30 मिनट तक तेज चलना, रक्त परिसंचरण को बढ़ा सकता है और धमनियों को रुकावटों से मुक्त रख सकता है। व्यायाम वजन को नियंत्रित करने में भी मदद करता है, जो स्ट्रोक की रोकथाम में एक और महत्वपूर्ण कारक है। फलों, सब्जियों और साबुत अनाज से भरपूर संतुलित आहार आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करते है जो समग्र हृदय स्वास्थ्य का समर्थन करते है।
    • रक्तचाप की निगरानी नियंत्रण सर्वोपरि है। उच्च रक्तचाप स्ट्रोक के लिए एक प्रमुख जोखिम कारक है, क्योंकि यह धमनियों पर अनावश्यक तनाव डालता है और उनके टूटने या रुकावट का कारण बन सकता है। नियमित जांच और निर्धारित दवाओं का पालन रक्तचाप को स्वस्थ सीमा के भीतर बनाए रखने में मदद कर सकता है।
    • इसी तरह, स्ट्रोक की रोकथाम के लिए कोलेस्ट्रॉल के स्तर को प्रबंधित करना महत्वपूर्ण है। एलडीएल कोलेस्ट्रॉल का उच्च स्तर धमनियों में प्लाक के निर्माण में योगदान कर सकता है, जिससे रक्त प्रवाह का मार्ग संकीर्ण हो जाता है। कम वसा वाला आहार अपनाने और संतृप्त और ट्रांस वसा के अत्यधिक सेवन से बचने से कोलेस्ट्रॉल के स्तर को नियंत्रित करने और स्ट्रोक के जोखिम को कम करने में मदद मिल सकती है।

    ब्रेन स्ट्रोक में और क्या सावधानियां बरतनी चाहिए, इसके बारे में जानने के लिए आपको लुधियाना में बेस्ट न्यूरोलॉजिस्ट का चयन जरूर से करना चाहिए।

    स्ट्रोक की रोकथाम कैसे करें ?

    • स्ट्रोक की रोकथाम में धूम्रपान छोड़ना एक अपरिहार्य कदम है। धूम्रपान न केवल रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचाता है बल्कि रक्त के थक्कों की संभावना को भी बढ़ा सकता है। इस आदत को छोड़कर, व्यक्ति अपने समग्र स्वास्थ्य में उल्लेखनीय रूप से सुधार करते है और स्ट्रोक के जोखिम को कम करते है।
    • शराब का सेवन नियंत्रित करना एक और बुद्धिमानी भरी सावधानी है। जबकि कुछ अध्ययनों से पता चलता है कि मध्यम शराब के सेवन से हृदय संबंधी लाभ हो सकते है, अत्यधिक शराब पीने से उच्च रक्तचाप हो सकता है और स्ट्रोक का खतरा हो सकता है। इसलिए, यदि शराब पीएं तो उसका सीमित मात्रा में आनंद लेना महत्वपूर्ण है।
    • तनाव प्रबंधन को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है, लेकिन यह अच्छे स्वास्थ्य को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। दीर्घकालिक तनाव उच्च रक्तचाप और अन्य हृदय संबंधी समस्याओं में योगदान कर सकता है। सरल विश्राम तकनीकें जैसे गहरी सांस लेना, ध्यान करना या शौक में शामिल होना तनाव के स्तर को प्रभावी ढंग से प्रबंधित कर सकता है और स्ट्रोक की रोकथाम में योगदान कर सकता है।
    • नियमित स्वास्थ्य जांच सिर्फ तबियत के लिए नहीं होती जब आप अस्वस्थ महसूस करते है। नियमित जांच से संभावित स्वास्थ्य समस्याओं को बढ़ने से पहले पहचानने और उनका समाधान करने में मदद मिलती है। रक्त परीक्षण, कोलेस्ट्रॉल जांच, और स्वास्थ्य देखभाल पेशेवरों के साथ जीवनशैली विकल्पों के बारे में चर्चा व्यक्तिगत स्ट्रोक जोखिम में मूल्यवान अंतर्दृष्टि प्रदान कर सकती है और निवारक उपायों का मार्गदर्शन कर सकती है।

    स्ट्रोक की रोकथाम के बाद भी अगर आपकी समस्या ठीक न हो तो इसके लिए आपको लुधियाना में बेस्ट न्यूरोसर्जन का चयन करना चाहिए।

    ब्रेन स्ट्रोक ठीक होने में कितना समय लगता है ?

    • ब्रेन स्ट्रोक की समस्या में मस्तिष्क तक ब्लड की सप्लाई करने वाली धमनियों में ब्लॉकेज हो जाता है और इसकी वजह से ब्लड फ्लो अधित होता है। 
    • ब्लड फ्लो रुकने पर ब्लड जमने लगता है और इसकी वजह से धमनियों में दबाव भी बढ़ता है। इसके कारण धमनियों डैमेज हो जाती है और ब्लीडिंग शुरु हो जाती है। 
    • इसकी वजह से मस्तिष्क तक रक्त का संचार नहीं हो पाता है। रक्त के और पोषक तत्वों के संचार के बिना ब्रेन टिश्यू, साथ ही कोशिकाओं को भी गंभीर नुकसान पहुंचता है। इसके कारण ब्रेन डेड की स्थिति पैदा हो जाता है।
    • ब्रेन स्ट्रोक एक इमरजेंसी स्थिति है, इस स्थिति में मरीज को तुरंत अस्पताल ले जाना चाहिए। इस समस्या में जरा सी चूक जानलेवा हो सकती है। आमतौर पर ब्रेन स्ट्रोक से मरीज को ठीक होने में महीने भर लग जाते है। 
    • वहीं मरीजों में ब्रेन स्ट्रोक की गंभीरता के आधार पर इसका रिकवरी टाइम अलग-अलग हो सकता है।

    ब्रेन स्ट्रोक के इलाज के लिए बेस्ट हॉस्पिटल ?

    ब्रेन स्ट्रोक की समस्या काफी खतरनाक मानी जाती है, तो अगर आप इस तरह की समस्या से निजात पाना चाहते है तो इसके लिए आपको न्यूरो सिटी हॉस्पिटल का चयन जरूर करना चाहिए।   

    निष्कर्ष :

    स्वस्थ और स्ट्रोक-मुक्त जीवन की इस यात्रा में रक्तचाप और कोलेस्ट्रॉल के स्तर की निगरानी करना, धूम्रपान छोड़ना, शराब का सेवन कम करना और नियमित स्वास्थ्य जांच में भाग लेना आवश्यक कदम है। याद रखें, ये सरल सावधानियां आपका कल्याण कर सकती है, जो आपके और मस्तिष्क स्ट्रोक की संभावित तबाही के बीच खड़े है।

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      जानिए इंसानी दिमाग में उपजे कीड़े का कैसे करें इलाज ?

      दिमाग में कीड़े का उत्पन्न होना काफी बड़ी समस्या है, दिमाग में कीड़े होने की बीमारी को न्यूरोसिस्टीसर्कोसिस भी कहते है। और ये कीड़ा कैसे क्यों और किन कारणों से हमारे दिमाग में उत्पन्न होता है और साथ ही क्या इसका इलाज मिलना संभव है या नहीं इसके बारे में आज के लेख में चर्चा करेंगे ;

      क्या है दिमागी कीड़ा ?

      • दरअसल दिमागी कीड़ा या यह बीमरी एक इन्फेक्शन है, जो तब होता है जब हमारे शरीर में टीनिया सोलियम परजीवी का लार्वा या अंडे हमारे शरीर में प्रवेश कर जाते है। 
      • सरल भाषा में कहें तो जब कोई व्यक्ति टेपवर्म के अंडे निगल लेता है, तो यह न्यूरोसिस्टीसर्कोसिस संक्रमण का कारण बनता है। ये अंडे मांसपेशियों और मस्तिष्क के टिशू में घुस जाते है और वहां सिस्ट का निर्माण करते है। 
      • जब ये अंडे मस्तिष्क में सिस्ट बना देते है, तो इससे न्यूरोसिस्टीसर्कोसिस की स्थिति पैदा हो जाती है।

      दिमाग में कीड़े के उत्पन्न होने के क्या कारण है ?

      • ‌‌‌दिमाग के अंदर कीड़े पड़ने का प्रमुख कारण, अशुद्व भोजन को खाना या आमतौर पर अशुद्व फल और सब्जी को खाना है। वहीं आपको बता दे की इन अशुद्ध भोजन और फल के साथ टेपवर्म के कीड़े चिपके होते है, जो हमारे पेट के अंदर सबसे पहले एंटर करते है और उसके बाद रक्तवाहिनी के सहारे हमारे दिमाग तक कूंच करते है।
      • यदि आप चाहते है की आपके दिमाग में टेपवर्म के कीड़े न उपजे तो इसके लिए आपको ‌‌‌दूषित पानी का सेवन नहीं करना चाहिए। 
      • ‌‌‌फल और सब्जियों का सेवन बिना धोए करने से भी आपके दिमाग में ये कीड़े उत्पन्न हो जाते है। 
      • यदि आप किसी ‌‌‌संक्रमित व्यक्ति के साथ रहते है तो भी इस कीड़े के उत्पन्न होने के काफी चान्सेस है। 
      • ‌‌‌बिना हाथ धोए भोजन करने से भी ये कीड़े उत्पन्न होते है। 
      • ‌‌सूअर और अन्य जानवरों का मांस खाने से भी ये कीड़े आपके दिमाग में जन्म लेने लगते है।

      अगर उपरोक्त कार्य करने की वजह से आपके दिमाग में भी कीड़ा उत्पन्न हो गया है, तो इससे बचाव के लिए आपको लुधियाना में बेस्ट न्यूरोलॉजिस्ट का चयन करना चाहिए।

      क्या है टेपवर्म का कीड़ा ?

      • टेपवर्म कीड़े की बात करें तो ये एक तरह का पैरासाइट है, जो अपने पोषण के लिए दूसरों पर आश्रित रहने वाला जीव है। इसलिए ये शरीर के अंदर पाया जाता है, ताकि उसे खाना मिल सके। 
      • वहीं इसमें रीढ़ की हड्डी नहीं होती है। साथ ही इसकी 5000 से ज़्यादा प्रजातियां पाई जाती है। ये एक मिमी से 15 मीटर तक लंबे हो सकते है।

      इलाज क्या है दिमाग में उत्पन्न हुए कीड़े का ?

      • अगर आप समय रहते न्यूरोसिस्टीसर्कोसिस के लक्षणों को पहचानकर एक अच्छे न्यूरोलॉजिस्ट से परामर्श करते है, तो आप इस इन्फेक्शन से आसनी से छुटकारा पा सकते है। वहीं जब आप डॉक्टर के पास जाते है, तो वह मस्तिष्क में सिस्ट की जांच के लिए कुछ सरल टेस्ट का सुझाव दे सकते है। 
      • आमतौर पर दिमाग में कीड़े का पता लगाने के लिए डॉक्टर के द्वारा MRI या CT ब्रेन स्कैन कराने की सलाह दी जाती है। कुछ मामलों में संक्रमण के निदान के लिए कुछ ब्लड टेस्ट भी किये जाते है, लेकिन संक्रमण हल्का होने पर स्पष्ट रूप से इन टेस्ट से पता नहीं चल पाता है। इसलिए ब्रेन स्कैन टेस्ट की सलाह अधिक दी जाती है।
      • एक बार दिमाग में कीड़े का निदान होने के बाद डॉक्टर इलाज के लिए आपको कुछ दवाएं दे सकते है, जिनमें एंटी-पैरासिटिक दवाइयां होती है।
      • हालांकि, स्थिति गंभीर होने पर कुछ मामलों में डॉक्टर सर्जरी की मदद से भी सिस्ट को हटा सकते है। लेकिन आमतौर पर डॉक्टर दवाओं की मदद से ही सफलतापूर्वक इसका इलाज करने में सक्षम होते है। 

      कुछ मामलों में दिमाग में उत्पन्न हुए कीड़े की सर्जरी की जाती है अगर आपको भी सर्जरी करवाने की सलाह डॉक्टर दे रहें है, तो इसके लिए आपको लुधियाना में बेस्ट न्यूरोसर्जन का चयन करना चाहिए।

      दिमागी कीड़े के इलाज के लिए बेस्ट हॉस्पिटल !

      आप दिमागी कीड़े का इलाज न्यूरो सिटी हॉस्पिटल से भी करवा सकते है, बस इसके लिए आपको अपने रोग के लिए सतर्क होने की जरूरत है। 

      निष्कर्ष :

      दिमाग में उत्पन्न हुआ कीड़ा काफी खतरनाक होता है इसलिए जरूरी है की अगर आपको शुरुआती दौर में ही पता चल जाए तो इसके लिए आपको डॉक्टर के सम्पर्क में आना चाहिए।

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        क्या मिर्गी महिलाओं में गर्भावस्था को प्रभावित कर सकती है?

        एक वक्त में कहा जाता था कि मिर्गी से पीड़ित महिलाए, कभी माँ नहीं बन सकती। लेकिन अब ऐसा नहीं है। हालांकि, अपने डॉक्टर के साथ विचार करने और योजना बनाने में कुछ चुनौतियां हैं। कुछ योजनाएं महत्वपूर्ण हैं, लेकिन मिर्गी से जुड़ी चुनौतियों का प्रबंधन करते हुए स्वस्थ गर्भावस्था भी संभव है। दौरे के संभावित प्रभाव और उन्हें नियंत्रित करने के लिए दी जाने वाली दवाएँ गर्भावस्था के दौरान अनोखी चिंताएँ पैदा करती हैं। हर साल मिर्गी से पीड़ित महिलाओं में लगभग 24,000 बच्चे पैदा होते हैं – जिनमें से अधिकांश स्वस्थ होते हैं।

        कैसे मिर्गी गर्भावस्था को प्रभावित करती है ? 

        गर्भावस्था के दौरान दौरे पड़ने पर निम्नलिखित समस्याओं का खतरा होता है:

        • भ्रूण की हृदय गति धीमी होना 
        • भ्रूण को ऑक्सीजन मिलना कम हो गया
        • अपरिपक्व प्रसूति
        • जन्म के समय कम वजन
        • समय से पहले जन्म
        • माँ को आघात, जैसे कि गिरना, जिससे भ्रूण को चोट लग सकती है, गर्भाशय से नाल का समय से पहले अलग होना (नाल का टूटना) या यहाँ तक कि भ्रूण की हानि भी हो सकती है

        दौरे पर नियंत्रण बनाए रखना आवश्यक है क्योंकि गर्भावस्था के दौरान दौरे के परिणामस्वरूप चोट लग सकती है और जटिलताओं की संभावना बढ़ सकती है। जटिलताएँ उत्पन्न होने की संभावना दौरे के प्रकार और आवृत्ति से जुड़ी होती है। फोकल दौरे में सामान्यीकृत दौरे जितना जोखिम नहीं होता है (लेकिन फोकल दौरे सामान्यीकृत हो सकते हैं)। सामान्यीकृत दौरे (विशेष रूप से टॉनिक-क्लोनिक वाले) माँ और बच्चे दोनों के लिए अधिक जोखिम रखते हैं।

         

        क्या मिर्गी माँ से पैदा होने वाली संतान में जा सकती है ?

        अगर माँ को मिर्गी की दिक्कत होगी और बाप को नहीं, तो तब भी १०० में से ५ खतरे का संकेत होगा। लेकिन दोनों को मिर्गी होनी बच्चे के लिए उच्च खतरा है। अक्सर बच्चे माता-पिता से मिर्गी विरासत में नहीं मिलेगी, लेकिन कुछ प्रकार की मिर्गी विरासत में मिलने की संभावना अधिक होती है।

        लेबर और बच्चे की डिलीवरी के समय अगर दौरे शुरू हो जाए, इसे अंतःशिरा दवा से रोका जा सकता है। यदि दौरा लंबे समय तक रहता है, तो आपका स्वास्थ्य देखभाल प्रदाता सी-सेक्शन द्वारा बच्चे को जन्म दे सकता है। ज्यादातर लोग जिनको मिर्गी की दिक्कत होती है बिना किसी समस्या के बच्चा आसानी से हो जाता है। हम महिलाओं से न्यूरल ट्यूब दोष के जोखिम को कम करने के लिए गर्भधारण से पहले फोलिक एसिड अनुपूरक लेने का आग्रह करते हैं, जो मस्तिष्क, रीढ़ और रीढ़ की हड्डी को प्रभावित करते हैं। मिर्गी से पीड़ित महिलाओं को अन्य महिलाओं की तुलना में अधिक फोलिक एसिड लेने की आवश्यकता हो सकती है – गर्भधारण से पहले दो से तीन महीने तक प्रतिदिन 4 मिलीग्राम तक। ऐसा इसलिए है क्योंकि मिर्गी-रोधी दवाएं (एईडी) शरीर में फोलिक एसिड के स्तर को कम कर सकती हैं। आपके 20-सप्ताह के अल्ट्रासाउंड के दौरान, हम उन विकृतियों की तलाश करेंगे जो एईडी के कारण हो सकती हैं। यह परीक्षा न्यूरल ट्यूब दोषों की तलाश के लिए प्रभावी है।

        मिर्गी और गर्भावस्था के जोखिमों को सुरक्षित रूप से कैसे प्रबंधित करें ?

        • याद से दवा- बूटी ली जाए 

        अपनी पूरी गर्भावस्था के दौरान बताई गई दौरे-रोधी दवाएं (एएसएम) लेती रहें। इससे आपको और आपके बच्चे के स्वास्थ्य को बनाए रखने में मदद मिलेगी।

        • महीने में सामान्य जांच 

        अपनी मिर्गी देखभाल टीम के साथ अपने एएसएम की मासिक स्तर-जांच शेड्यूल करने और आवश्यकता पड़ने पर खुराक समायोजित करने की योजना बनाएं। गर्भावस्था से पहले के आधारभूत स्तर को बनाए रखने के लिए अधिकांश एएसएम को गर्भावस्था के दौरान खुराक बढ़ाने की आवश्यकता होगी।

        • नींद को अग्गे रखे 

        नींद की कमी कई लोगों के लिए दौरे का एक सामान्य कारण है, चाहे वे गर्भवती हों या नहीं। एक सुसंगत नींद योजना बनाने के लिए अपनी देखभाल टीम के साथ काम करें।

        • अपने दौरे आने को ट्रैक करें 

        अपनी जब्ती गतिविधि पर नज़र रखें। इसे अपनी गर्भावस्था और मिर्गी देखभाल टीमों के साथ अक्सर साझा करें। दौरे के मामूली लक्षण भी यह संकेत दे सकते हैं कि आपको दौरे पड़ने की संभावना बढ़ रही है।

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          सिर दर्द के प्रकार और घरेलु उपायों को जानकर हम कैसे इससे छुटकारा पा सकते है ?

          सिरदर्द एक आम बीमारी है जो हमारे दैनिक जीवन को बाधित कर सकती है। सिरदर्द के प्रकारों को समझना और सरल घरेलू उपचार अपनाने से दर्द और परेशानी को कम करने में मदद मिल सकती है। इस ब्लॉग में, हम विभिन्न प्रकार के सिरदर्द और प्रभावी घरेलू उपचारों का पता लगाएंगे, तो सिर दर्द से पाना है निजात तो लेख के साथ अंत तक बने रहें ;

          सिर दर्द के प्रकार क्या है ?

          तनाव वाला सिर दर्द –

          तनावग्रस्त सिरदर्द अक्सर तनाव और चिंता के कारण होता है। उनमें लगातार, हल्का दर्द महसूस होता है, जो आमतौर पर सिर के दोनों तरफ महसूस होता है।

          तनाव से होने वाले सिरदर्द को कम करने के लिए, व्यक्ति गहरी साँस लेने के व्यायाम और ध्यान जैसी विश्राम तकनीकों का अभ्यास कर सकते है। ये गतिविधियाँ तनाव को कम करती है और मांसपेशियों को आराम देती है, जिससे सिरदर्द से राहत मिल सकती है।

          आधासीसी –

          माइग्रेन तीव्र होता है और अक्सर मतली, प्रकाश और ध्वनि के प्रति संवेदनशीलता जैसे लक्षणों के साथ होता है। वे आमतौर पर सिर के एक तरफ को प्रभावित करते है।

          घर पर माइग्रेन का प्रबंधन करने के लिए, व्यक्ति आराम करने के लिए एक शांत, अंधेरा कमरा ढूंढ सकते है, माथे पर ठंडा सेक लगा सकते है और मतली और सूजन को कम करने के लिए अदरक की चाय पी सकते है।

          क्लस्टर का सिर दर्द –

          क्लस्टर सिरदर्द अविश्वसनीय रूप से दर्दनाक होते है और कुछ हफ्तों या महीनों की अवधि में समूहों में होते है, जिसके बाद सिरदर्द-मुक्त अंतराल होता है।

          क्लस्टर सिरदर्द के दौरे के दौरान, शुद्ध ऑक्सीजन लेना फायदेमंद हो सकता है। ऑक्सीजन थेरेपी सिरदर्द की गंभीरता और अवधि को कम करने में मदद कर सकती है।

          क्लस्टर सिर दर्द से राहत पाने के लिए लुधियाना में बेस्ट न्यूरोलॉजिस्ट से सलाह लें। 

          साइनस सिरदर्द –

          साइनस सिरदर्द साइनस संक्रमण और एलर्जी से जुड़ा हुआ है। वे माथे, गाल की हड्डियों और नाक में दर्द का कारण बनते है।

          साइनस सिरदर्द को कम करने के लिए, सेलाइन नेज़ल स्प्रे या नेति पॉट का उपयोग करने से जमाव को दूर करने और दबाव से राहत पाने में मदद मिल सकती है। साइनस सिरदर्द को कम करने के लिए भाप लेना एक और प्रभावी उपाय है।

          कैफीन निकासी सिरदर्द –

          कैफीन वापसी सिरदर्द अक्सर कैफीन सेवन में अचानक कमी से उत्पन्न होता है।

          इन सिरदर्द को कम करने के लिए, कैफीन का सेवन अचानक बंद करने के बजाय धीरे-धीरे कम करें। हाइड्रेटेड रहने और पर्याप्त नींद लेने से भी इन सिरदर्द की तीव्रता कम हो सकती है।

          निर्जलीकरण सिरदर्द –

          अपर्याप्त तरल पदार्थ के सेवन से निर्जलीकरण सिरदर्द उत्पन्न होता है, जिससे मस्तिष्क अस्थायी रूप से सिकुड़ जाता है।

          निर्जलीकरण सिरदर्द को रोकने और राहत देने के लिए, पूरे दिन खूब पानी पिएं और तरबूज और ककड़ी जैसे पानी से भरपूर फल और सब्जियां खाएं।

          सभी प्रकार के सिर-दर्द के लिए घरेलू उपचार क्या है ?

          जलयोजन : 

          विभिन्न प्रकार के सिर-दर्द को रोकने के लिए पर्याप्त रूप से हाइड्रेटेड रहना आवश्यक है। इसलिए दिन में कम से कम 8 गिलास पानी जरूर पियें।

          आराम : 

          पर्याप्त आराम और नींद सिर-दर्द के लक्षणों को कम करने में मदद कर सकती है।

          संतुलित आहार : 

          नियमित भोजन के साथ संतुलित आहार बनाए रखें। खाना छोड़ने से कुछ लोगों में सिर-दर्द हो सकता है।

          ठंडी सिकाई करें : 

          माथे पर ठंडी सिकाई करने से क्षेत्र को सुन्न करके और सूजन को कम करके त्वरित राहत मिल सकती है।

          पेपरमिंट ऑयल : 

          तनाव से होने वाले सिरदर्द को कम करने के लिए पेपरमिंट ऑयल को कनपटी पर ऊपर से लगाया जा सकता है।

          अदरक की चाय का सेवन करें : 

          अदरक में सूजनरोधी गुण होते है जो माइग्रेन के लक्षणों को कम करने में मदद कर सकते है।

          अरोमाथेरेपी : 

          लैवेंडर, पेपरमिंट, या नीलगिरी के आवश्यक तेलों की सुगंध सिरदर्द के दर्द से राहत दिलाने में मदद कर सकती है।

          ट्रिगर से बचें : 

          व्यक्तिगत सिरदर्द ट्रिगर को पहचानें और उनसे बचें, जिसमें कुछ खाद्य पदार्थ, पेय या पर्यावरणीय कारक शामिल हो सकते है।

          इन खाने की चीजों को अपनाने के बाद भी आपको सिर दर्द की समस्या से राहत न मिले, तो इससे बचाव के लिए आपको लुधियाना में बेस्ट न्यूरोसर्जन का चयन करना चाहिए।

          सिर दर्द की समस्या से बचाव के लिए बेस्ट हॉस्पिटल !

          अगर लगातार आप सिर दर्द की समस्या से परेशान है तो कृपया इसे नज़रअंदाज़ न करें बल्कि इसके इलाज के लिए आपको न्यूरो सिटी हॉस्पिटल का चयन करना चाहिए। इसके अलावा अगर आप सामान्य सिर दर्द से परेशान है तो इसके इलाज में घरेलु उपाय काफी मददगार होते है, बसर्ते की आपको इसके इलाज के लिए घरेलु उपायों को काफी अच्छे से फॉलो करना है पर उपायों को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर से जरूर सलाह लें।

          सारांश :

          सिरदर्द के प्रकारों को समझकर और सरल घरेलू उपचार अपनाकर, व्यक्ति सिरदर्द के दर्द को प्रभावी ढंग से प्रबंधित और कम कर सकते है। चाहे यह तनाव वाला सिरदर्द हो, माइग्रेन हो, या कोई अन्य प्रकार हो, विश्राम तकनीकों, उचित जलयोव जन और प्राकृतिक उपचारों का उपयोग दवा की आवश्यकता के बिना राहत लाने में मदद कर सकता है।

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            Stroke: मस्तिष्काघात होने पर प्राथमिक चिकित्सा को कैसे ध्यान में रखें!

            मस्तिष्काघात जोकि हमारे दिमाग पर लगने वाली चोट की वजह से होती है, इसके कारण व्यक्ति को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। वही मस्तिष्काघात होने पर हमे कौन-से प्राथमिक उपचार के बारे में पता होना चाहिए, इसके बारे में आज के आर्टिकल में चर्चा करेंगे तो अगर आप भी सामान्य चोट या किसी अन्य सिर दर्द की समस्या से परेशान है तो आर्टिकल के साथ अंत तक बने रहें ;

            क्या होता है मस्तिष्काघात ?

            • मस्तिष्काघात तब होता है जब सिर (चेहरे या गर्दन) या ऊपरी शरीर पर हल्की चोट लगने से मस्तिष्क की कार्यप्रणाली प्रभावित होती है। सिर को जोर से हिलाने से भी मस्तिष्काघात हो सकता है।  
            • आघात से मस्तिष्क की अस्थायी कार्यप्रणाली और वैकल्पिक मानसिक स्थिति का नुकसान होता है। यदि उपचार न किया जाए, तो यह पुरानी स्थिति शरीर व मस्तिष्क की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचा सकती है।

            दिमागी जाँच या मस्तिष्काघात के बारे में जानने के लिए आपको लुधियाना में बेस्ट न्यूरोलॉजिस्ट के पास जाना चाहिए।

            मस्तिष्काघात या आघात के लक्षण क्या है ?

            • भूलने की बीमारी या स्मृति हानि, जिसके परिणामस्वरूप उस घटना को भूल जाते हैं जिसके कारण मस्तिष्काघात हुआ था।
            • सिरदर्द की समस्या। 
            • मतली और उल्टी की समस्या। 
            • कानों में आवाज का आना। 
            • थकान और चक्कर आना। 
            • धुंधली दृष्टि या देखने में परेशानी आ आना। 
            • भ्रम की भावना का आना। 
            • बोलने में देरी की समस्या।     
            • चेतना का नुकसान होना। 
            • चिड़चिड़ापन और व्यक्तित्व में अन्य परिवर्तन का आना। 
            • नींद में परेशानी का सामना करना। 
            • चीजों को भूल जाना। 
            • प्रकाश या शोर संवेदनशीलता महसूस करना आदि।

            यदि आपके दिमाग पर गहरा आघात हुआ है जिसकी वजह से आपको सर्जरी का सहारा लेना पड़े तो इसके लिए आप लुधियाना में बेस्ट न्यूरोसर्जन का चयन कर सकते है।

            मस्तिष्काघात या आघात के लिए कौन-सी प्राथमिक चिकित्सा का चयन करें ?

            • जब किसी को सिर में चोट लगती है, तो हमेशा मान लेना चाहिए कि इससे मस्तिष्काघात हो सकता है। क्युकि ऐसा मान लेना से आप स्थिति को संभालने में सफल साबित होंगे। 
            • इसके बाद आपको व्यक्ति को सुरक्षित स्थान पर पहुँचाना चाहिए।
            • यदि आप आघात के वक़्त गंभीर लक्षण देखते है, तो तत्काल आपको चिकित्सा सहायता का चयन करना चाहिए। 
            • सुनिश्चित करें कि व्यक्ति सांस ले रहा है और उसे सांस लेने में कोई परेशानी नहीं हो रही है।
            • वे सामान्य व्यवहार कर सकते है जैसे की उन्हें चोट लगा ही न हो। 
            • पीड़ित को शराब न पीने दें।
            • चोट लगने के बाद रोगी का निरीक्षण करें क्योंकि लक्षण देर से दिखाई दे सकते है।

            मस्तिष्काघात होने पर डॉक्टर का चयन कब करना चाहिए ?

            • जब होश 30 सेकंड से अधिक समय न आए। 
            • तीव्र सिरदर्द जो समय के साथ बिगड़ जाता है। 
            • नाक या कान से खून बहना या तरल पदार्थ का निकलना। 
            • कानों में लगातार बजने जैसा कुछ सुनाई देना। 
            • देखने में परेशानी का सामना करना। 
            • भटकाव और भ्रम की समस्या आदि।

            मस्तिष्काघात के जोखिम कारक क्या है ?   

            • फ़ुटबॉल, बॉक्सिंग, रग्बी आदि जैसे उच्च जोखिम वाले खेल खेलते समय चोट का लगना।
            • सही सुरक्षा उपकरण के बिना खेलते जाना। 
            • शारीरिक शोषण का अनुभव करना या लड़ाई में शामिल होना। 
            • अगर आप कार दुर्घटना या मोटरसाइकिल दुर्घटना से ग्रस्त है। 
            • पिछला चिकित्सा इतिहास आघात के लिए महत्वपूर्ण है। 

            सुझाव :

            • अगर आपके सिर में गंभीर चोट लग गई है तो इससे बचाव के लिए आपको बिना समय गवाए न्यूरो सीटी हॉस्पिटल का चयन करना चाहिए। 

            निष्कर्ष :

            • लक्षण ज्यादा गंभीर होने पर खुद से प्राथमिक चिकित्सा करने से बचे और समय रहते जोखिम हुए व्यक्ति को डॉक्टर के पास ले जाए।

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              इन पांच चीजों को खाने से आपके बच्चे का दिमाग घोड़े से भी तेज चलेगा !

              बच्चों का दिमाग तेज हो ऐसी चाहत हर माँ-बाप की होती है, और कही न कही इसके लिए वो काफी कुछ करते भी है ताकि उनके बच्चे का दिमाग तेज हो सकें, लेकिन आज के लेख में हम कुछ ऐसे खाने की चीजों के बारे में बताएंगे जिसको अपनाने मात्र से आपके बच्चे का दिमाग तेज हो सकता है, तो चलिए जानते है की वो ऐसे कौन-से उपाय है;

              कैसे बनाए बच्चों के दिमाग को तेज ?

              • बच्चों के दिमाग को तेज करने की शुरुआत हम उनके बचपन से ही कर सकते है और इसके लिए आपको उनके बचपन में वो सब चीजे शामिल करनी चाहिए जो उनको अच्छे से पोषण दे सकें और उनके दिमाग की शक्ति को बढ़ा सकें। 
              • इसके अलावा आप अपने बच्चे को प्रेरित करें की वो हर स्कूल की एक्टिविटी में शामिल हो। 
              • अपने बच्चे को कोशिश करें की वो ऑलराउंडर हो हर चीज में।  
              • बच्चे के दिमाग को तेज करने के लिए आप उनके साथ दिमागी खेल भी खेल सकते है जैसे, शतरंज आदि।

              आपका बच्चा मानसिक रूप से मजबूत बन सकें इसके लिए आपको चाहिए की आप लुधियाना में बेस्ट न्यूरोलॉजिस्ट से सलाह लें।

              कौन-सी पांच चीजे खाने से बच्चे का दिमाग होगा घोड़े से भी तेज ?

              • सबसे पहले तो आप अंडे को बच्चे की डाइट में शामिल करें खास कर ग्रोइंग एज के बच्‍चों की डाइट में, ऐसा इसलिए क्युकी अंडे में मौजूद विटामिन्‍स, कैल्शियम, प्रोटीन ब्रेन डेवलपमेंट के लिए बहुत ही जरूरी है, वहीं जब बढ़ते बच्‍चों के‍ दिमाग को भरपूर विटामिंस मिलता है तो उनका दिमाग तेज से काम करने लगता है। 
              • अलसी और कद्दू के बीज को भी दिमाग के स्वास्थ्य के लिए बेहतरीन माना जाता है, कद्दू और अलसी के बीजों में जिंक के साथ ही मैग्नीशियम, विटामिन बी भरपूर मात्रा में होते है, जिससे मानसिक क्षमताएं विकसित होती है और बच्चों की याददाश्त में भी इजाफा होता है। 
              • रोजाना बच्चे को दही देना भी उसके अच्छे दिमाग के लिए काफी सहायक माना जाता है, इसलिए जरूरी है की आप अपने बच्चे के आहार में दही को जरूर शामिल करें। 
              • अगर आप मांसाहारी है तो अपने बच्चे की मेमोरी बढ़ाने के लिए उनको मछली का सेवन कराए, वहीं बचपन से हम और आप सुनते आ रहे है कि मछली खाने से दिमाग अच्‍छा होता है, दरअसल मछली में बहुत मात्रा में विटामिन डी और ओमेगा 3 होता है जो बढ़ते बच्‍चों के मेंटल डेवलपमेंट के लिए बहुत मददगार साबित होता है। 
              • अखरोट और अन्य ड्राई फ्रू्ट्स आपके दिमाग के लिए सुपर फूड माना जाता है, वहीं अखरोट अल्फा-लिनोलेनिक एसिड और पॉलीफेनोलिक कंपाउंड्स से भरपूर होता है। ओमेगा-3 फैटी एसिड और पॉलीफेनोल्स दोनों को ही बेहद अहम ब्रेन फूड माना जाता है क्योंकि ये दोनों ऑक्सीडेटिव तनाव से लड़ने का काम करते है।
              • बचपन की अवस्था होती ही इतनी नाजुक है, और अक्सर इसी अवस्था में खेल कूद में बच्चों को चोट लग जाती है लेकिन कई बार चोट इतनी गंभीर होती है की उनके दिमाग पर गहरा असर छोड़ती है, जिससे उनका दिमाग तेज चलना बंद हो जाता है इसलिए बचपन की अवस्था में अपने बच्चे का खास ध्यान रखें और दिमागी चोट होने पर जल्द लुधियाना में बेस्ट न्यूरोसर्जन के पास आए।

              सुझाव :

              अगर दिमागी चोट के कारण आपके बच्चे का दिमाग ठीक से नहीं चल पा रहा तो इसके लिए आप जल्द डॉक्टर के संपर्क में आए। और ऐसी दिमागी चोट के इलाज के लिए आपको न्यूरो सिटी हॉस्पिटल का चयन करना चाहिए। 

              निष्कर्ष :

              उम्मीद करते है की आपको पता चल गया होगा की आप किस तरह से अपने बच्चे का दिमाग तेज कर सकती है बस इसके लिए जरूरी है की आप उपरोक्त डाइट को फॉलो करें और समय-समय आप अपने बच्चे के दिमाग की जाँच को भी करवाते रहें ताकि उनके शरीर या दिमाग में किसी तरह की कोई परेशानी उत्पन्न न हो सकें।

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                इस जांच की मदद से ब्रेन स्ट्रोक के खतरे को पहचानना कैसे होगा और भी आसान ?

                ब्रेन स्ट्रोक की पहचान और रोकथाम एक महत्वपूर्ण चिकित्सा चुनौती हमेशा रही है। हालाँकि, नैदानिक परीक्षणों में हाल की सफलताओं ने स्ट्रोक के जोखिम का आकलन करने के तरीके में क्रांति ला दी है। अत्याधुनिक तकनीक का उपयोग करने वाला यह नया परीक्षण, स्ट्रोक जोखिम मूल्यांकन के परिदृश्य को नया आकार दे रहा है। तो आइये जानने की कोशिश करते है की आप ब्रेन स्ट्रोक का पता किस तरह की जांच को करवा कर लगा सकते है ;

                किस तरह की जाँच से ब्रेन स्ट्रोक का पता लगाया जा सकता है ?  

                • वर्तमान में, चिकित्सा पेशेवर किसी व्यक्ति के स्ट्रोक का अनुभव करने के जोखिम को निर्धारित करने के लिए विभिन्न परीक्षणों और मूल्यांकनों का उपयोग करते है। इन पारंपरिक तरीकों में “रक्त परीक्षण, इमेजिंग स्कैन और व्यक्तिगत जोखिम” कारकों का मूल्यांकन शामिल है। हालाँकि ये विधियाँ कुछ हद तक प्रभावी है, नया परीक्षण अधिक सटीक और व्यापक मूल्यांकन का वादा करते है।
                • नवोन्वेषी परीक्षण बायोमार्कर के विश्लेषण और एआई-संचालित एल्गोरिदम के उपयोग के सिद्धांतों पर संचालित होता है। रक्त या लार जैसे शारीरिक तरल पदार्थों में मौजूद विशिष्ट बायोमार्कर की जांच करके, परीक्षण स्ट्रोक के बढ़ते जोखिम से जुड़े संभावित संकेतकों की पहचान कर सकते है। इन बायोमार्कर में प्रोटीन और आनुवंशिक कारक शामिल होते है जो सूजन, थक्के जमने की प्रवृत्ति और संवहनी स्वास्थ्य का संकेत देते है।
                • उन्नत एल्गोरिदम के उपयोग के माध्यम से, परीक्षण बड़ी मात्रा में डेटा को तेजी से और सटीक रूप से संसाधित कर सकता है। इन एल्गोरिदम को विभिन्न बायोमार्करों के बीच पैटर्न और सहसंबंधों को पहचानने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है, जिससे स्ट्रोक जोखिम मूल्यांकन की सटीकता बढ़ जाती है। नतीजतन, यह परीक्षण अधिक सूक्ष्म और विस्तृत विश्लेषण प्रदान कर सकता है, जिससे चिकित्सा पेशेवरों को स्ट्रोक की बेहतर भविष्यवाणी करने और रोकने में सक्षम बनाया जा सकता है।
                • इसके अलावा, परीक्षण की सरलता और गैर-आक्रामक प्रकृति इसकी अपील को बढ़ाते है। मरीज़ बिना किसी परेशानी या असुविधा के आसानी से आवश्यक नमूने प्रदान कर सकते है। परिणामों के त्वरित बदलाव का समय इसकी व्यावहारिकता को और बढ़ाता है, जिससे निवारक उपायों के संबंध में त्वरित निर्णय लेने की अनुमति मिलती है।
                • इस परीक्षण के निहितार्थ पर्याप्त हैं. पारंपरिक तरीकों की तुलना में स्ट्रोक के उच्च जोखिम वाले व्यक्तियों की पहचान करने की इसकी क्षमता सक्रिय हस्तक्षेप की अनुमति देती है। प्रारंभिक पहचान चिकित्सा पेशेवरों को जीवनशैली में बदलाव, दवाएं या विशिष्ट हस्तक्षेप जैसे लक्षित निवारक उपायों को लागू करने में सक्षम बनाती है, जिससे स्ट्रोक होने की संभावना काफी कम हो जाती है।
                • इसके अलावा, नियमित जांच या स्वास्थ्य जांच में इस परीक्षण का एकीकरण सार्वजनिक स्वास्थ्य रणनीतियों में क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है। यह स्वास्थ्य देखभाल के लिए अधिक वैयक्तिकृत दृष्टिकोण को सक्षम बनाता है, जहां व्यक्ति अपने विशिष्ट जोखिम प्रोफाइल के आधार पर अनुरूप हस्तक्षेप प्राप्त कर सकते है।
                • जैसे-जैसे चिकित्सा समुदाय इस परीक्षण को परिष्कृत और बेहतर बनाते जा रहें है, चल रहे अनुसंधान इसकी क्षमताओं का विस्तार करना चाहते है। भविष्य के पुनरावृत्तियों में अतिरिक्त बायोमार्कर शामिल हो सकते है और अधिक सटीकता के लिए एल्गोरिदम को परिष्कृत किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, पहनने योग्य प्रौद्योगिकी या स्मार्टफोन अनुप्रयोगों के साथ इस परीक्षण के एकीकरण का पता लगाया जा रहा है, जिससे संभावित स्ट्रोक जोखिमों के लिए वास्तविक समय की निगरानी और तत्काल अलर्ट की अनुमति मिल सके।
                • सरलता, सटीकता और व्यापक कार्यान्वयन की क्षमता इस परीक्षण को स्ट्रोक जोखिम मूल्यांकन में गेम-चेंजर बनाती है। इसमें निवारक स्वास्थ्य देखभाल के प्रति हमारे दृष्टिकोण को बदलने की क्षमता है, जिससे हमारा ध्यान प्रतिक्रियाशील उपचारों से हटकर सक्रिय, वैयक्तिकृत देखभाल पर केंद्रित हो जाता है।

                यदि आप स्ट्रोक की जाँच करवा कर उसका पता लगाना चाहते है, तो इसके लिए आपको लुधियाना में बेस्ट न्यूरोलॉजिस्ट का चयन करना चाहिए।

                ब्रेन स्ट्रोक की समस्या क्या है ?

                • जब मस्तिष्क में ब्लड की आपूर्ति (supply) बाधित हो जाती है या पूरी तरह से कम हो जाती है तो उस स्थिति को स्ट्रोक की समस्या कहते है। स्ट्रोक होने पर मस्तिष्क पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन और पोषक तत्व ग्रहण नहीं कर पाता है जिसके कारण मस्तिष्क की कोशिकाएं नष्ट होने लगती है। स्ट्रोक को ब्रेन अटैक भी कहा जाता है। 
                • यदि स्ट्रोक की समस्या का समय पर निदान और इलाज न किया जाये तो मस्तिष्क हमेशा के लिए डैमेज हो सकता है जिसके परिणामस्वरूप व्यक्ति की मौत भी हो सकती है।

                तो अगर आप ब्रेन स्ट्रोक की समस्या या मौत के मुँह में जाने से खुद का बचाव करना चाहते है, तो इसके लिए आपको लुधियाना में बेस्ट न्यूरोसर्जन का चयन करना चाहिए।

                ब्रेन स्ट्रोक की जाँच के लिए बेस्ट हॉस्पिटल !

                जैसे की आपको पता ही चल गया होगा की ब्रेन स्ट्रोक की समस्या कितनी खतरनाक है, अगर समय पर इस समस्या का पता नहीं लगाया गया तो व्यक्ति की मौत भी हो सकती है। वहीं इस समस्या का सामना आप या आपके कोई करीबी कर रहें है तो इसके लिए उन्हें न्यूरोसिटी हॉस्पिटल का चयन करना चाहिए।

                निष्कर्ष : 

                इस सफल परीक्षण का विकास मस्तिष्क स्ट्रोक के जोखिम को पहचानने और कम करने की हमारी क्षमता को महत्वपूर्ण रूप से बढ़ाने के लिए तैयार है। बायोमार्कर और उन्नत एल्गोरिदम का लाभ उठाकर, यह परीक्षण मूल्यांकन का अधिक सटीक और कुशल तरीका प्रदान करते है। इसकी गैर-आक्रामक प्रकृति, त्वरित परिणामों के साथ मिलकर, इसे रोगियों और चिकित्सा चिकित्सकों दोनों के लिए एक व्यावहारिक उपकरण बनाती है। जैसे-जैसे अनुसंधान आगे बढ़ रहा है, नियमित स्वास्थ्य देखभाल प्रथाओं में इस परीक्षण का एकीकरण अनगिनत स्ट्रोक को रोकने का वादा करता है, जिससे जीवन की बचत होती है और समग्र सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार होता है।

                जैसे कि हम इस परीक्षण के निरंतर विकास और परिशोधन को देख रहे है, भविष्य में स्ट्रोक के जोखिम की शीघ्र पहचान और शमन के लिए महान संभावनाएं है, जो अंततः निवारक स्वास्थ्य देखभाल के परिदृश्य को बदल देते है।

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                  • December 22, 2025

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                  मानसून के मौसम में माइग्रेन की समस्या क्या है – जानिए इसके कारण, लक्षण, रोकथाम और इलाज !

                  माइग्रेन जोकि खतरनाक वाला सिरदर्द है जो दुनिया भर में लाखों लोगों को प्रभावित करता है। हालाँकि वे किसी भी समय हमला कर सकते है, लेकिन मानसून के मौसम के दौरान वे अक्सर अधिक प्रचलित हो जाते है और प्रबंधन करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। इस ब्लॉग में, हम इस बरसात के मौसम में माइग्रेन के कारणों, लक्षणों, रोकथाम और उपचार के विकल्पों का पता लगाएंगे ;

                  मानसूनी माइग्रेन के क्या कारण है ?

                  • तापमान और वायुमंडलीय दबाव में अचानक बदलाव से संवेदनशील व्यक्तियों में माइग्रेन हो सकता है।
                  • उच्च आर्द्रता के स्तर से निर्जलीकरण हो सकता है, जो एक ज्ञात माइग्रेन ट्रिगर है।
                  • नमी की स्थिति के कारण फफूंद और पराग के स्तर में वृद्धि एलर्जी वाले लोगों में माइग्रेन को बढ़ा सकती है।
                  • बादल छाए आसमान और मंद प्राकृतिक रोशनी लोगों को कृत्रिम रोशनी के प्रति अधिक संवेदनशील बना सकती है, जो माइग्रेन को ट्रिगर कर सकती है।

                  मानसूनी माइग्रेन के लक्षण क्या है ?

                  • मानसून के मौसम में माइग्रेन के लक्षणों की पहचान करना समय पर हस्तक्षेप के लिए महत्वपूर्ण है। सामान्य माइग्रेन के लक्षणों में शामिल हैं:
                  • गंभीर, धड़कता हुआ दर्द, जो अक्सर सिर के एक तरफ होता है।
                  • माइग्रेन के कारण तीव्र मतली हो सकती है, जिससे कभी-कभी उल्टी भी हो सकती है।
                  • प्रकाश (फोटोफोबिया) और ध्वनि (फोनोफोबिया) के प्रति बढ़ी हुई संवेदनशीलता सामान्य है।
                  • कुछ व्यक्तियों को सिरदर्द शुरू होने से पहले दृश्य गड़बड़ी का अनुभव होता है, जैसे चमकती रोशनी या टेढ़ी-मेढ़ी रेखाएं।

                  यदि माइग्रेन के लक्षण लगातार गंभीर होते जाए तो इससे बचाव के लिए आपको लुधियाना में बेस्ट न्यूरोलॉजिस्ट का चयन करना चाहिए।

                  मानसूनी माइग्रेन के दौरान किस तरह के रोकथाम को अपनाएं!

                  • हालाँकि आप मौसम को नियंत्रित नहीं कर सकते, लेकिन आप मानसून के मौसम में माइग्रेन को रोकने के लिए कदम उठा सकते है, जैसे –
                  • निर्जलीकरण से निपटने के लिए खूब पानी पिएं, जो आर्द्र परिस्थितियों में माइग्रेन का एक आम कारण है।
                  • तनाव को कम करने के लिए ध्यान और गहरी सांस लेने जैसी विश्राम तकनीकों का अभ्यास करें, जो माइग्रेन को कम कर सकें।
                  • नींद से संबंधित ट्रिगर्स को कम करने के लिए लगातार नींद का शेड्यूल बनाए रखें।
                  • ऐसे खाद्य पदार्थों से बचें जो माइग्रेन को ट्रिगर कर सकते है, जैसे कैफीन, शराब, प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ और कृत्रिम योजक वाले खाद्य पदार्थ।
                  • अपनी आँखों को तेज़ या टिमटिमाती रोशनी से बचाने के लिए धूप का चश्मा या चौड़ी किनारी वाली टोपी पहनें।
                  • यदि आपको एलर्जी है, तो उचित प्रबंधन के लिए एंटीहिस्टामाइन लें या किसी एलर्जी विशेषज्ञ से परामर्श लें।

                  यदि रोकथाम करने के बाद भी इसकी समस्या लगातार बढ़ते जाए तो इससे बचाव के लिए आपको लुधियाना में बेस्ट न्यूरोसर्जन का चयन करना चाहिए।

                  मानसूनी माइग्रेन का इलाज क्या है ?

                  जब मानसून के मौसम में माइग्रेन होता है, तो यह जानना आवश्यक है कि दर्द को कैसे कम किया जाए ;

                  ओवर-द-काउंटर दवाएं लें : 

                  इबुप्रोफेन या एसिटामिनोफेन जैसी गैर-पर्ची दर्द निवारक दवाएं यदि निर्देशानुसार ली जाएं तो राहत मिल सकती है।

                  प्रिस्क्रिप्शन दवाएं : 

                  ट्रिप्टान या मतली-रोधी दवाओं जैसी मजबूत माइग्रेन-विशिष्ट दवाओं के लिए स्वास्थ्य सेवा प्रदाता से परामर्श लें।

                  आराम और अंधेरा कमरा अपनाए : 

                  संवेदी उत्तेजनाओं को कम करने के लिए एक शांत, अंधेरे कमरे में लेटें।

                  ठंडी सिकाई करें : 

                  दर्द को कम करने और सूजन को कम करने के लिए अपने माथे पर ठंडी सिकाई करें।

                  जलयोजन : 

                  हाइड्रेटेड रहने और मतली को कम करने के लिए पानी या हर्बल चाय पियें।

                  कैफीन : 

                  कुछ मामलों में, कैफीन की थोड़ी मात्रा माइग्रेन के लक्षणों से राहत दिलाने में मदद कर सकती है। लेकिन इसकी कुछ ही मात्रा लें वो भी डॉक्टर के सलाह पर। 

                  पेशेवर मदद : 

                  क्रोनिक माइग्रेन या मानक उपचारों के प्रति प्रतिरोधी माइग्रेन के लिए, किसी न्यूरोलॉजिस्ट या सिर दर्द विशेषज्ञ से परामर्श लेने पर विचार करें।

                  मानसूनी माइग्रेन की समस्या के इलाज के लिए बेस्ट हॉस्पिटल !

                  अगर आप मानसून के मौसम में आने वाले माइग्रेन की समस्या से खुद का बचाव करना चाहते है, तो इसके लिए आपको न्यूरो सिटी हॉस्पिटल का चयन करना चाहिए, पर ध्यान रहें अगर अभी आपके माइग्रेन की शुरुआत हुई है तो आप इससे बहुत ही आसानी से खुद का बचाव कर सकते है, वो भी खुद का अच्छे से ध्यान रखकर। पर अगर स्थिति गंभीर हो जाए तो इसके लिए आप इस हॉस्पिटल के डॉक्टर का चयन कर सकते है। 

                  निष्कर्ष :

                  याद रखें कि जो एक व्यक्ति के लिए उपचार काम करता है वह दूसरे के लिए काम नहीं कर सकता है, इसलिए अपने अद्वितीय ट्रिगर्स की पहचान करना और इस बरसात के मौसम के दौरान माइग्रेन से निपटने के लिए एक व्यक्तिगत योजना विकसित करना आवश्यक है। उचित देखभाल और जागरूकता के साथ, आप माइग्रेन के प्रभाव को कम कर सकते है और मानसून के मौसम का पूरा लुफ्त उठा सकते है। 

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                    • January 7, 2026

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                    • December 22, 2025

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                    Pediatric neurological disorders can negatively impact children’s mental and cognitive health. This…

                    क्या है पार्किंसंस रोग की समस्या व इसके इलाज के लिए कौन-से हॉस्पिटल है बेहतरीन ?

                    आज के समय में पार्किंसंस रोग एक ऐसी समस्या है, जिसमे शरीर का संतुलन बनाए रखने और अन्य शारीरिक गतिविधियां करने में व्यक्ति को समस्या का सामना करना पड़ता है। यह बढ़ती उम्र के साथ होने वाला रोग है, जिसे मृत्यु के सबसे अहम 15 कारणों की सूची में शामिल किया गया है। देखा जाए तो इस बीमारी के बारे में लोगों को ज्यादा मालूम नहीं है, इसलिए आज के लेख में हम पार्किंसंस रोग की समस्या से कैसे खुद का बचाव कर सकते है, और साथ ही ये समस्या है क्या ? इसके बारे में भी चर्चा करेंगे ;

                    पार्किंसंस रोग क्या है ?

                    • पार्किंसंस रोग केंद्रीय तंत्रिका तंत्र का एक न्यूरोडीजेनेरेटिव रोग है। इस बीमारी में दिमाग में डोपामाइन नामक रसायन का उत्पादन बंद हो जाता है, जिसके चलते शरीर का संतुलन बनाए रखने में समस्या होती है। साथ ही चलने में समस्या, शरीर में अकड़न व कंपन जैसी समस्याएं भी होने लगती है।
                    • एक रिपोर्ट के अनुसार, पार्किंसन रोग 60 साल की उम्र के बाद होता है, लेकिन कुछ 5 से 10 प्रतिशत मामलों में यह 50 के आसपास भी हो सकता है। बताया जाता है कि पार्किंसंस रोग का जोखिम पुरुषों में महिलाओं के मुकाबले 50 प्रतिशत ज्यादा होता है। यह रोग आनुवंशिक भी हो सकता है, लेकिन ऐसा हर बार हो जरूरी नहीं है। 

                    वहीं मुख्य रूप से इसके दो प्रकार होते है।

                    • “प्राइमरी या इडियोपेथिक”, इसमें न्यूरोन्स के खत्म होने की वजह का पता नहीं होता।
                    • “सेकंडरी या एक्वायर्ड”, में रोग का कारण पता होता है, जैसे ड्रग्स, संक्रमण, ट्यूमर, विषाक्ता आदि।
                    • पार्किंसंस रोग की समस्या के शुरुआती दौर से बचाव के लिए आपको लुधियाना में बेस्ट न्यूरोलॉजिस्ट का चयन करना चाहिए।

                    पार्किंसंस रोग की समस्या का शिकार कौन लोग होते है ? 

                    • इस बीमारी के होने और विकसित होने के लिए उम्र सबसे बड़ा जोखिम कारक है, ज्यादातर लोग जो इस बीमारी से पीड़ित है, उनकी उम्र 60 वर्ष या उससे अधिक है।
                    • महिलाओं की तुलना में पुरुषों को यह बीमारी ज्यादा होती है।
                    • कुछ प्रतिशत लोग आनुवंशिकता के कारण भी इस रोग की चपेट में आ सकते है।
                    • सिर में चोट लगने या किसी बीमारी के कारण भी व्यक्ति पार्किंसंस रोग का शिकार हो सकता है।
                    • फलों और सब्जियों पर कीटनाशक रसायनों का छिड़काव करने से भी इस बीमारी के होने का खतरा रहता है।

                    पार्किंसंस रोग के कारण क्या है ? 

                    • धूम्रपान का सेवन करना।
                    • मोटापे की समस्या का सामना करना।
                    • शारीरिक गतिविधियों में कमी का आना।
                    • भोजन में अत्यधिक नमक का सेवन करना।
                    • बढ़ती उम्र भी इसके प्रमुख कारण में शामिल है।
                    • आनुवंशिकता भी इसके एक कारण में शामिल है।
                    • शराब का सेवन करना।
                    • तनाव और थायराइड की समस्या का सामना करना।
                    • गुर्दे से जुड़ा पुराना रोग भी इसके कारण में शामिल है।

                    पार्किंसंस रोग के लक्षण क्या है ?

                    • शरीर के किसी भाग में कंपन का होना, खासकर हाथ में। 
                    • मांसपेशियों में ऐंठन की समस्या। 
                    • शरीर को संतुलित रखने में समस्या का सामना करना। 
                    • शारीरिक गतिविधियां, जैसे, चलना व करवट बदलने आदि में धीमेपन का आना। 
                    • आवाज में नरमाहट का आना। 
                    • आंखों को झपकाने में दिक्कत का सामना करना। 
                    • खाना या पानी निगलने में समस्या का सामना करना। 
                    • मूड स्विंग जैसे कि अवसाद आदि की समस्या। 
                    • बार-बार नींद खुलने की समस्या का सामना करना। 
                    • बेहोशी का छाना। 
                    • शारीरिक संबंधों में कम रुचि रखना। 
                    • आंत और मूत्राशय की गतिविधियों में गड़बड़ी का सामना करना। 
                    • थकान महसूस करना। 
                    • किसी भी कार्य में रुचि का कम होना। 
                    • कब्ज की समस्या का सामना करना। 
                    • कम या उच्च रक्तचाप की समस्या का होना।

                    अगर आपके शरीर में गंभीर लक्षण नज़र आए और इन लक्षणों का उपचार सर्जरी के माध्यम से संभव हो तो इसके लिए आपको लुधियाना में बेस्ट न्यूरोसर्जन का चयन करना चाहिए।

                    पार्किंसंस रोग के कितने स्टेज है ?

                    इसके स्टेज को कुछ अनुभवी डॉक्टरों के द्वारा पांच भागों में विभाजित किया गया है, जैसे ;

                    1. इसके पहले स्टेज में, पार्किंसंस सबसे हल्के रूप में होता है। आपको पहले स्टेज में कोई भी लक्षणों का अनुभव नहीं हो सकता है जो ध्यान देने योग्य है। यह भी हो सकता है कि वे अभी तक आपके दैनिक जीवन और कार्यों में न आए।
                    2. दूसरे स्टेज में स्टेज 1 से स्टेज 2 तक की प्रगति में महीनों या साल का समय भी लग सकता है। हर व्यक्ति को दूसरी स्टेज में अलग अनुभव होते है। इस मध्यम स्तर पर, आप कुछ लक्षणों का अनुभव कर सकते है, जैसे –
                    • मांसपेशियों में जकड़न की समस्या। 
                    • झटके की समस्या। 
                    • चेहरे के भावों में बदलाव का आना।
                    • सब कुछ हिलता हुआ या धुंधला दिखाई देना। 
                    1. तीसरे स्टेज, में व्यक्ति को पार्किंसंस के लक्षण महसूस होते है। जबकि आपको नए लक्षणों का अनुभव होने की संभावना नहीं है, वे अधिक ध्यान देने योग्य हो सकते है। वे आपके सभी दैनिक कार्यों को करने में भी बाधा डाल सकते है।
                    2. चौथे स्टेज, में व्यक्ति को वॉकर या सहायक उपकरण के बिना खड़े होने में भी कठिनाई का अनुभव हो सकता है। इस दौरान व्यक्ति की प्रतिक्रियाएं और मांसपेशियों की गति भी काफी धीमी हो जाती है। इसलिए इस तरह के मरीज को अकेले नहीं छोड़ना चाहिए।
                    3. पांचवे स्टेज, में जोकि यह आखिरी स्टेज है पार्किंसंस रोग का इसलिए इसमें मरीज को गंभीर लक्षण देखने को मिलते है। असंभव नहीं तो खड़ा होना मुश्किल होगा। एक व्हीलचेयर की आवश्यकता होने की संभावना होगी। इसके अलावा, इस स्तर पर, पार्किंसंस वाले व्यक्ति, भ्रम और मतिभ्रम का अनुभव कर सकते है। रोग की ये जटिलताएं बाद के चरणों में शुरू हो सकती है।

                    पार्किंसंस रोग में क्या करें और क्या न करें ?

                    क्या करें ; 

                    • व्यायाम करें क्योंकि यह पार्किंसंस रोग से निपटने में काफी मदद कर सकता है।
                    • सकारात्मक दृष्टिकोण, दृढ़ इच्छाशक्ति और दृढ़ संकल्प रखें।
                    • यदि आवश्यक हो तो चलने की छड़ी का प्रयोग करें।
                    • गर्म और ठंडे खाद्य पदार्थों का अलग-अलग सेवन करें।
                    • फाइबर का सेवन बढ़ाएं।
                    • शॉवर के अंदर शॉवर चेयर का इस्तेमाल करें।

                    क्या न करें ;

                    • परिस्थितियों के प्रति कठोर रहें।
                    • यह मानना ​​बंद कर दें कि सब कुछ खराब है।
                    • खुद को आइसोलेट रखें। 
                    • बहुत अधिक मीठे खाद्य पदार्थ और पेय पदार्थ ना खाएं। 
                    • बहुत अधिक सोडियम, ट्रांस वसा, कोलेस्ट्रॉल और संतृप्त वसा का सेवन करें। 
                    • कुर्सी या बिस्तर से अचानक उठ खड़े हों।

                    पार्किंसंस रोग के इलाज के लिए बेहतरीन हॉस्पिटल !

                    पार्किंसंस रोग को नज़रअंदाज़ करना काफी खतरनाक हो सकता है आपके लिए, क्युकि इस रोग में व्यक्ति का ठीक से चल पाना काफी मुश्किल होता है और ऐसी समस्या में शरीर भी ठीक से कार्य करने में असमर्थ होता है। 

                    अगर पार्किंसंस रोग के दौरान आपके लक्षण भी गंभीर नज़र आए तो इससे बचाव के लिए आपको न्यूरो सिटी हॉस्पिटल का चयन करना चाहिए। वहीं इस हॉस्पिटल का चयन इसलिए करना चाहिए क्युकि यहाँ पर अनुभवी डॉक्टरों के द्वारा मरीज़ों का इलाज आधुनिक उपकरण की मदद से किया जाता है।

                    निष्कर्ष :

                    पार्किंसंस रोग गंभीर समस्या है इसलिए इसके शुरुआती के लक्षण नज़र आने पर आपको इसके इलाज के लिए डॉक्टर का चयन करना चाहिए। और स्थिति ज्यादा न बिगड़े इसके लिए आपको समय-समय पर डॉक्टरों के द्वारा बताई गई दवाइयों का सेवन करते रहना चाहिए। और इस रोग में किसी भी तरह की दवाई का सेवन खुद से न करें।

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